काव्य :
पर्यावरण की रक्षा
पर्यावरण मानो अक्सर ही रोता रहता है,
वृक्षों के कट जाने पर रो-रो कर कहता है।
ऐसे मूर्ख न बन, हे मनु! मुझे बचा जा,
शुद्ध हवा से अपना जीवन सजा जा।
वृक्षों को संभालो, वे ऑक्सीजन बनाते हैं,
जीव-जंतुओं की मां बनकर उन्हें पालते हैं।
शहरों में पर्यावरण सदा प्रदूषित होता है,
जल-वायु के दूषण से हर घर रोग ग्रसित होता है।
पर्यावरण मानो अक्सर ही रोता रहता है....
प्लास्टिक छोड़ो, कागज के थैले अपनाओ,
भूमि प्रदूषण रोको, प्रकृति को स्वच्छ बनाओ।
मानव कर्तव्य को तुम अब तो पहचानो,
पर्यावरण बचाओ, प्रकृति को माता जानो।
छोटे-छोटे प्रयासों से योगदान करना होता है,
एक वृक्ष बस मां के नाम लगाना होता है।
पर्यावरण की रक्षा करके ,जीवन बचाना होता है,
हरियाली के आभूषणों से सृष्टि को सजाना होता है।
पर्यावरण मानो अक्सर ही रोता रहता है ....
- श्रीमती अंजना दिलीप दास
बसना छत्तीसगढ़
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