काव्य :
लव जिहाद, झूठे प्यार से देह व्यापार में फंसी एक अबला....
मैं मरती नित पल पल....
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इंजी. अरुण कुमार जैन
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तुम आये मेरे पास देह का सुख पाने,
मादक, मांसल काया से, दैहिक तृप्ति पाने.
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काया देखी तुमने, न मन देख सके,
छल, कपट, वेदना से हूँ घायल, न लेख सके.
तुम जैसा ही कोई, जीवन में आया था,
संग मोहक बातों की मिश्री भी लाया था.
मैं भोली अंजानी, उसको सच मान लिया,
अपने मन मंदिर की मूरत
सा जान लिया.
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वह इंद्रधनुष से दिन, रातें थीं मधुवन सीं,
सम्मोहन, आकर्षण वश मैं छली गयी.
वह कपटी, कामी ले आया, छलकर मुझको,
बंध मोहपाश में, जान सकी न मैं उसको.
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कपटी,कामी,पापी और दुराचारी वह था,
करके सौदा मेरा, मुझको उसने बेच दिया.
माँ, बाप, बहिन की सीख
भूल, मैं छली गयी,
घर की प्यारी बिटिया न बन, मैं सदा मरी.
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मैं रोयी, बिलखी, रही कलपती नित्य मिटी,
मर्मान्तक वेदना, रोम रोम में, विपुल घनी.
कोई भगवान बचाने मुझको नहीं आये,
मेरी घनी वेदना प्रभु न लख पाये.
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भूख पेट की सह न सकी, स्वीकार किया,
अस्मत अपनी, लज्जा का, मैंने व्यापार किया.
तुम जैसों को नित तृप्ति, वेदना मुझको देती,
मैं मरती नित पल पल,
पर देह नहीं मरती.
रोम रोम से आँसू, पल पल बहते हैं,
मेरी लाचारी, निरीहता,
की गाथा ये कहते हैं.
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देखो इनको, समझो,
मरहम लगा दो तुम,
हूँ अभागी द्रोपदी सी,
कृष्ण बुला दो तुम.
मन में आशा, नयनों में दीप जला दो तुम,
इस गहन नर्क से, अब तो
मुक्ति दिला दो तुम.
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मैं युगों युगों तक, अश्रु से चरण पखारुँगी,
मन श्रद्धा के सुमनों का अर्घ्य चढ़ाऊंगी.
मेरे मन मंदिर के, आराध्य परम बन जाओगे,
धधके, झूलसे मन पर चंदन बन जाओगे.
नर्क वेदना से मुक्ति मैं पाऊँगी,
द्रोपदी, मीरा, राधा तेरी
बन जाउंगी.
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संपर्क //16,वीनस, मीनाक्षी प्लेनेट सिटी, बाग मुगलिया, भोपाल, मध्य प्रदेश.
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