लघुकथा :
पुण्य
क्लब के मंच पर तालियाँ गूँज रही थीं।
बैनर पर लिखा था — “गरीब कन्या के विवाह हेतु सहयोग”।
सामान की लंबी सूची थी—फ्रिज, टी वी, वॉशिंग मशीन, बिस्तर, बर्तन, यहाँ तक कि सोने की चैन भी।
अध्यक्ष महोदय ने गर्व से कहा,
“हमने एक बेटी का घर बसाने का पुण्य कमाया है।”
भीड़ में खड़ा घुमंतू चुपचाप देख रहा था।
पास ही लड़की की माँ किसी से कह रही थी—
“भगवान इन लोगों का भला करे… वरना हम इतनी व्यवस्था कहाँ से करते…”
घुमंतू से रहा नहीं गया। उसने धीरे से पूछा—
“माँजी, अगर ये सब न होता तो क्या शादी नहीं होती?”
माँ की आँखें झुक गईं।
“शादी तो हो जाती… पर फिर बेटी को उम्र भर सुनना पड़ता—
‘खाली हाथ आई है… कुछ लेकर नहीं आई…’ ” माँ की आवाज मानो कहीं दूर से आ रही थी।
घुमंतू ने गहरी साँस ली,
“तो फिर ये आपकी मदद नहीं,
उन तानों को पहले ही चुकता करने का इंतज़ाम है…”
मंच पर फिर तालियाँ बजीं।
इस बार घुमंतू को लगा—
जैसे हर ताली, दहेज की एक और परत को मजबूत कर रही है।
- डॉ अंजना गर्ग
(सेवानिवृत)
म द वि रोहतक
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