काव्य :
डीजिटल शिक्षा
कर रहे हैं दिमाग की बत्ती अब ये धीरे-धीरे गुल,
नए-नए गैजेट्स और एडवांस एप्स फूलम फुल,
ए. आई का आया है अब असाधारण ख़ास ज़माना,
क्यों अपना दिमाग बोलो ज्यादा खामखां खपाना ।
चाहे कोई भी विषय से संबंधित हो अनगिनत सवाल,
बस चैट जी पीटी करो झट मोबाइल में तुम इन्स्टॉल,
पूरी दुनिया का ज्ञान आज उंगलियों पर यूँ मिल जाता,
अपनों से सलाह मशवरा लेने कहॉं अब कोई है जाता ।
डीजिटल शिक्षा का भी चल पड़ा है गरमा-गरम दौर,
मानसिक स्वास्थ्य अनुचित प्रयोग से हो रहा कमजोर,
आगे पीछे इन यंत्रों के अनावश्यक हर कोई रहा डोल,
मूर्खता में मशीनों को ही सौंप दिया स्वयं का कंट्रोल ।
स्वयं की तार्किक क्षमता और मेमोरी हो रही है कम,
बच्चों को मिली सुविधाएं मगर सिर बोझिल एकदम,
शिक्षा ग्रहण का तरीका हो सही संग "आनंद' न हो लुप्त,
वरना भुगतेंगे खामियाजा जो स्वचेतना हो गई सुप्त ।
- मोनिका डागा “आनंद" ,चेन्नई
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