सूर्य स्वयं ही भगवान परशुराम के रूप में जन्मे थे
सतयुग में ब्रह्मा की मानसी सृष्टि एवं प्रजापति की मैथुनी सृष्टि के मध्य निर्बाध संबंध होते थे । भगवान परशुराम महर्षि जमदग्नि एवं मां रेणुका के सुपुत्र थे। उन्होंने अस्त्र-शास्त्र की विद्या भगवान शिव से प्राप्त की थी । भगवान शिव उनके गुरु थे जमदग्नि जी रघुकुल के ऋचिक ऋषि के सुपुत्र थे। इनकी माता सत्यवती ब्रह्म ऋषि विश्वामित्र की बहन थी। जमदग्नि को विश्वामित्र के पक्ष का एवं वशिष्ठ के विपक्ष का बतलाया जाता है एक बार वशिष्ठ के पुत्र शक्ति ने सौदास के यज्ञ में विश्वामित्र को हराकर भगा दिया था, तब जमदग्नि जी ने सूर्य से स सर्वरी विधा लेकर विश्वामित्र को दी । यह विद्या वाणी को प्रखर बनाती है, इस विद्या के सहारे विश्वामित्र ने शक्ति को हराया । जमदग्नि अत्यंत क्रोधी थे, मां रेणुका क्षत्रिय वंश की थी, एक बार कड़ी धूप में जमदग्नि धनुष अभ्यास कर रहे थे, रेणुका जी बाण उठाकर ला रही थी उसी समय वह छाया में बैठ गई उन्हें आने में विलंब हो गया तब क्रुद्ध होकर जमदग्नि ने सूर्य को सिद्ध करने का प्रयास किया सूर्य ने उन्हें छाता और पादुका लाकर दी । उसके बाद भगवान सूर्य ही भगवान परशुराम के रूप में महर्षि जमदग्नि के पुत्र बनकर जन्मे। एक बार महर्षि जमदग्नि रेणुका जी से त्रस्त हो गए तब उन्होंने अपने पुत्र से रेणुका जी का वध करने को कहा...पर कोई तैयार नहीं हुआ लेकिन पुत्र परशुराम जी ने पिताजी की आज्ञा का पालन कर मां रेणुका का शिरोच्छेदन कर दिया इस बात पर जमदग्नि ने प्रसन्न होकर पुत्र परशुराम से वर मांगने को कहा परशुराम ने वर के रूप में मां रेणुका को पुनर्जीवित करने का वर मांगा। जमदग्नि ने रेणुका जी को पुनर्जीवित तो किया साथ ही पुत्र परशुराम को अमरत्व का वरदान भी दिया । पौराणिक साहित्य में तीन राम हुए हैं परशुराम, राम और बलराम तीनों ही शस्त्र धारी थे । श्रीमद भगवत गीता में भगवान कृष्ण ने 11 अध्याय में कहा है...
रामः शस्त्र भृताम्याह्म महर्षि जमदग्नि के समय क्षत्रिय निरंकुश हो गये थे हैहय देशाधिपति कार्तवीर्य का राज्य सरस्वती से लेकर नर्मदा तक फैला हुआ था । जमदग्नि से वह पराजित हो गया था पर कालांतर में जमदग्नि अत्यंत शांत हो गए स्वयं क्रोध भी उनको क्रोधित ना कर सका जब कार्तवीर्य के पुत्र जमदग्नि से युद्ध के लिए आए तब जमदग्नि शांत रहे । कार्तवीर्य के पुत्रों ने उन पर इक्कीस बार घात किए इससे महर्षि जमदग्नि की मृत्यु हो गई। जब यह तथ्य महर्षि परशुराम को मालूम पड़ा तब उन्होंने इक्कीस बार धरा को क्षत्रिय विहीन करने का प्रण किया उन्होंने 21 बार तो धरती को क्षत्रिय विहीन किया ही जब वे 22 वे बार नरसंहार के लिए आगे बढ़े तब भगवान ब्रह्मा जी ने आकर कहा आप अपने प्रण के अनुसार धरती को 21 बार क्षत्रिय विहीन कर चुके हैं अब नरसंहार मत कीजिए यह ऋषि मुनियों को शोभा नहीं देता इस पर महर्षि परशुराम ने नरसंहार रोक दिया। त्रेता युग में सीर ध्वज जनक ने प्रण किया कि जो भगवान शंकर का धनुष चढ़ा देगा उसी से सीता जी का विवाह वह कर देंगे भगवान राम ने वह धनुष ना केवल चढ़ाया बल्कि बल्कि भंग भी कर दिया, यह बात परशुराम जी को ज्ञात हुई चूंकि वह धनुष उनके गुरु भगवान शंकर का था जिससे भगवान परशुराम क्रोधित हो गए, पर अंत में यह जानकर कि राम विष्णु के ही अवतार हैं तो वे संतुष्ट होकर चले गए द्वापर युग में कर्ण ने स्वयं ब्राह्मण बताकर परशुराम जी से शस्त्र विद्या प्राप्त की जबकि परशुराम प्रतिज्ञा कर चुके थे कि ब्राह्मणों के अलावा वह किसी को भी शिक्षा प्रदान नहीं करेंगे । एक बार परशुराम जी ने कर्ण की गोद में सिर रखकर विश्राम कर रहे थे तभी कर्ण को कोई कीड़ा काटता रहा, कर्ण मात्र इसीलिए सहता रहा कि परशुराम जी की नींद भंग हो जावेगी मगर कर्ण के पैर से रक्त निकलने पर परशुराम जी की नींद भंग हो गई वे समझ गए की ब्राह्मण इतना सहनशील नहीं होता अर्थात कर्ण ब्राह्मण नहीं है तभी उन्होंने कर्ण को श्राप का भय दिखाकर कर्ण से सच उगलवा लिया सच सुनते ही परशुराम जी ने कर्ण को श्राप दिया की जब उसको ब्रह्मास्त्र की आवश्यकता होगी तब वह विद्या भूल जाएगा। परशुराम जी एक क्षत्रिय ब्राह्मण के नाती एवं एक क्षत्राणि के पुत्र थे इसीलिए वे युद्ध कौशल में निपुण थे उनके जीवन की कुछ विसंगतियां भी पुराणों में है जैसे भगवान शंकर के धनुष भंग के समय अपने नाना विश्वामित्र को क्यों नहीं पहचान पाए? यहां तुलसीदास जी चुप कर बैठे महर्षि वाल्मीकि के अनुसार वे भगवान राम से बारात के लौट के समय मिले थे भगवान परशुराम एक कुशल योद्धा एक योग्य गुरु एवं ब्रह्मऋषि वंश की यशोपताका थे अनेक वीरों के साथ उसे अपराजिता ब्राह्मण के युद्ध हुए पर वह हर कभी नहीं उनका हृदय बहुत नरम था वे कारण को मार भी सकते थे या भगवान राम को श्राप भी दे सकते थे पर उन्होंने ऐसा नहीं किया उन्हें भगवान का अवतार माना जाता है ।
- डॉ. कौशल किशोर श्रीवास्तव
171 विशु नगर , परासिया मार्ग
छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश
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