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विरासत दिवस पर विशेष : हमारी अमूर्त विरासत को महसूस करते हैं - प्रो. ऊषा अग्रवाल ,मंदसौर


 

विरासत दिवस पर विशेष : 

हमारी अमूर्त विरासत को महसूस करते हैं

 - प्रो. ऊषा अग्रवाल

विभागाध्यक्ष इतिहास 

पी जी कॉलेज मंदसौर 

(प्रस्तुति डॉ घनश्याम बटवाल)

     कभी सोचा है कि जब हम राजस्थान जाते हैं तो कालबेलिया नृत्य देखने क्यों रुकते हैं? या नागालैंड के हॉर्नबिल फेस्टिवल में विदेशी पर्यटक क्यों उमड़ते हैं? इसका जवाब है - *अमूर्त सांस्कृतिक विरासत*। ये वो चीजें हैं जिन्हें आप छू नहीं सकते, म्यूजियम में रख नहीं सकते, पर महसूस कर सकते हैं।

 1. **अमूर्त विरासत क्या है ?

सीधे शब्दों में - हमारे दादा-दादी से मिली वो सारी चीजें जो 'सामान' नहीं हैं। जैसे:

- *लोक गीत-नृत्य*: गरबा, भांगड़ा, लावणी, घूमर

- *त्योहार-मेले*: कुंभ, पुष्कर मेला, दुर्गा पूजा, बिहू

- *कला-शिल्प*: मधुबनी पेंटिंग, वारली आर्ट, चिकनकारी

- *खान-पान और रीति-रिवाज*: शादी की रस्में, व्रत-उपवास के नियम

- *कहानियां और ज्ञान*: दादी की लोककथा, आयुर्वेद, खेती के देसी तरीके

- ⁠जीवन जीने की शैली 

ये सब मिलाकर हमारी 'पहचान' बनती है। यूनेस्को भी मानता है कि इमारतें टूट सकती हैं, पर ये विरासत अगर खो गई तो दोबारा नहीं बनेगी।

2. घूमने-फिरने से इसका क्या लेना-देना?

आजकल पर्यटक सिर्फ ताजमहल की फोटो खींचने नहीं आता। उसे 'अनुभव' चाहिए। वहाँ की स्थानीय संस्कृति का, खानपान का.

उदाहरण: 

1. केरल गया कोई पर्यटक । बैकवॉटर तो देखा ही, पर शाम को कथकली डांस भी देखा ।साथ में स्थानीय भोजन भी खाया। घर जाकर 10 लोगों को बताया। अगला साल 20 लोग और आए।

2. कुंभ 2019 में 12 करोड़ लोग आए। 1.2 लाख करोड़ रु का कारोबार हुआ। चाय बेचने वाले से लेकर नाव चलाने वाले तक - सबकी कमाई हुई।

मतलब साफ है: *हमारी संस्कृति ही सबसे बड़ा टूरिस्ट अट्रैक्शन है*। और टूरिस्ट से जो पैसा आता है, वही हमारी संस्कृति को जिंदा रखता है।

3. फायदे किसे-किसे?

1. *गांव के कलाकार को*: पहले मधुबनी पेंटिंग बनाने वाली दादी को 50 रु मिलते थे। अब टूरिस्ट वर्कशॉप में 1 दिन का 2000 रु मिल जाता है। बेटी भी सीखने लगी है।

2. *युवाओं को*: DJ पर नाचने लड़के लड़किया आदिवासी नृत्य सीख रहे है,क्योंकि फेस्टिवल में परफॉर्म करने के पैसे मिलते हैं। पलायन रुका।

3. *महिलाओं को*: कच्छ की अजरक प्रिंट और काछी कढ़ाई ।

राजस्थान की लाख की चूड़ी% काम महिलाएं करती हैं। टूरिज्म से सीधा बाजार मिला, साहूकार के चंगुल से आज़ादी मिली।

आपको-हमको: अपनी जड़ें पता चलती हैं। गर्व होता है।

खतरे भी हैं

हर सिक्के के दो पहलू हैं

1. *नकलीपन का डर*: ज्यादा पैसे के चक्कर में 1 घंटे की रामलीला को 15 मिनट का 'शो' बना दिया। पर्यटक खुश, पर आत्मा मर गई।

2. *भीड़ से परेशानी*: गोवा का कार्निवल लोकल लोगों के लिए मुसीबत बन गया। शराब-डीजे से मूल संस्कृति दब गई।पुष्कर बर्बाद हो गया ।

3. *फायदा किसे*: बड़ी होटल के मालिक ने तो बहुत लाभ कमाए, पर जिस कलाकार ने डांस किया,उसे 500 रु मिले। ये गलत है।

बचाना कैसे है?

उपाय –

1. देखो पर छेड़ो मत : जैसे मंदिर में चप्पल उतारते हो, वैसे ही किसी जनजाति के गांव में जाओ तो उनके नियम मानो। बिना पूछे फोटो मत खींचो।

2. लोकल से खरीदो : मॉल से नहीं, गांव के हाट से सामान लो। पैसा सीधा कलाकार की जेब में जाए।

3. मोबाइल का सही इस्तेमाल : रील बनाओ पर मजाक मत उड़ाओ। Sahapedia जैसी वेबसाइट पर जाकर अपनी विरासत के बारे में पढ़ो, शेयर करो।

4. सरकार और कंपनियां साथ आएं : जैसे टाटा कंपनी ने 'कलाप्रदर्शन' कराया, सरकार ने 'स्वदेश दर्शन' से ट्रेन चलाई ऐसे प्रयास होने चाहिए।

आखिरी बात: ये हमारे हाथ में है

अमूर्त विरासत ATM मशीन नहीं है कि जब मन किया पैसा निकाल लिया। ये पौधा है - पानी दोगे तो फल देगा, वरना सूख जाएगा।

अगली बार जब कहीं घूमने जाओ, तो 1 दिन 'लोकल' के लिए रखो। वहां का नाच देखो, खाना खाओ, बूढ़े लोगों से कहानी सुनो। सेल्फी के साथ-साथ एक 'सेल्फ-लर्निंग' भी करके आओ।

ताजमहल जैसी इमारतें दुनिया में और भी बनाई जा सकती हैं, पर आपकी दादी की लोरी या आपके गांव का वह अनोखा त्योहार एक बार खो गया तो हमेशा के लिए चला जाएगा।

याद रखना: हम घूमने जाते हैं 'देखने', पर असल में हम 'बचाने' जाते हैं।

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देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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