काव्य :
स्वर्णिम पत्तों की पाजेब
टूटकर डाली से स्वर्णिम
पत्र यूं उड़ने लगे,
जैसे कवि के गीत के
पन्ने बिखरने से लगे।
रंग गई धरती सुनहरे
रंग में ऐसी सजी,
गुनगुनाई हवा जब
पाजेब पत्तों की बजी।
नियत क्रम मोहक
प्रकृति का अंत या आरंभ हो,
क्यों मनुज को रूप, धन
या शक्ति का फिर दंभ हो?
-डाॅ. सुधा कुमारी
नई दिल्ली
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