काव्य :
हिचकियाँ
हिचकियाँ
आती हैं क्या?
झूठ कहते हैं लोग
कि किसी के याद करने पर
आती है हिचकी।
कुछ अटक जाता है सांसों में
मुझे रुकावट महसूस होती है
भँवर- सा उठता है
गले से आंखों तक
उसमें तेजी से घूमते हैं
तुम्हारे कहे शब्द, मेरी हँसी
पहला स्पर्श , आखिरी लफ्ज़
तैरती हैं दो कत्थई आँखें,
मैं एकांत में खुद को कोसती हूँ
अधखुले बाल, क्लिप लगाकर
हथेलियों में नाखून चुभा लेती हूँ
काम करते , कार चलाते हुए
तुम्हारे पसंदीदा गीत सुनते हुए
पढ़ते हुए किताब सरका देती हूँ ;
तकिए को चूमती हूँ।
सागर-सा रोम रोम खारा है,
लहरें फेंक आती है किनारे,
स्मृतियों के गिद्ध , मेरे अंतर्मन
को नोच नोचकर,
बड़े चाव से खाते हैं
प्रेम किंवदंती है,
कि तुम्हें और मुझे
हिचकी नहीं आती ।
- जूही गुप्ते, पुणे
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बहुत सुंदर अभिव्यक्ति। हार्दिक बधाई हो, जूही जी। 👋🍧
ReplyDeleteलतिका