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काव्य : हिचकियाँ - जूही गुप्ते, पुणे


 

काव्य : 

हिचकियाँ


हिचकियाँ 

आती हैं क्या?


झूठ कहते हैं लोग

कि किसी के याद करने पर

आती है हिचकी।


कुछ अटक जाता है सांसों में 

मुझे रुकावट महसूस होती है

भँवर- सा उठता है

गले से आंखों तक

उसमें तेजी से घूमते हैं 

तुम्हारे कहे शब्द, मेरी हँसी 

पहला स्पर्श , आखिरी लफ्ज़

तैरती हैं दो कत्थई आँखें,


मैं एकांत में खुद को कोसती हूँ 

अधखुले बाल, क्लिप लगाकर

हथेलियों में नाखून चुभा लेती हूँ 


काम करते , कार चलाते हुए

तुम्हारे पसंदीदा गीत सुनते हुए

पढ़ते हुए किताब सरका देती हूँ ;

तकिए को चूमती हूँ।


सागर-सा रोम रोम खारा है,

लहरें फेंक आती है किनारे,

स्मृतियों के गिद्ध , मेरे अंतर्मन 

को नोच नोचकर,  

बड़े चाव से खाते हैं 


प्रेम किंवदंती है,

कि तुम्हें और मुझे

हिचकी नहीं आती ।


- जूही गुप्ते, पुणे

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

1 Comments

  1. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति। हार्दिक बधाई हो, जूही जी। 👋🍧

    लतिका

    ReplyDelete
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