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काव्य : परेड - श्रीराम निवारिया


 काव्य :

परेड

 - श्रीराम निवारिया


शामिल हैं हम सब परेड में

बचना और बचाना है

पल से लेकर युग तक  

यह जरूरी भी है और मजबूरी भी


खिंचा है धनुष बंदूक तनी है

दुश्मन ताक में

निशाने पर उसके हम 

परेड छोड़ विश्राम की मुद्रा में जब होंगे 

बस उसी क्षण हर कोई शिकार होंगे


समीक्षा के धोबी को धोते रहना है

पछीटते रहना है

मनुष्यता के सूत-सूत को

न्याय की चमक होने लगी है धूमिल 

इन्हीं सूत से बना है चादर 

जिसे ओढ़ रखा है देश ने


बहुत मेहनत से

पहले सोच के टूट रहे सूत को

जोड़ा है कबीर ने 

तब कतिया, कुरमी, कोरी, मेहरा, महारों ने

बुनी अपने जीवन से भी बड़ी चादर 

पृथ्वी को अपनी जागीर समझने वाले

नाखून इरादों के जागीरदारों ने

शुरु कर दिया है

सूतों को पहुँचाना नुकसान 


कहो माँ या पिता भारत को

मूर्ति बनाने का काम 

समणों ने ही किया है

मूर्ति बेजान पाषाण ही बनी रहती

जैसे हजारों मूर्तियाँ आज भी

खड़ी हैं बेजान  

प्राणप्रतिष्ठा कर देने के बाद भी


पर भारत पिता-भारत माँ

मानव है इसपर रहने वाले

अब मँगल ग्रह की यात्रा पर हैं

जो बुलेट ट्रेन से, तेज प्लेन से

पानी के जहाज और चार लेन-छह लेन 

एक्सप्रेस वे से उड़ सक रहे हैं

प्राण और गति देने वाला उनको

किसान है देश का


सवाल खड़ा कर सकते हैं

जिसे किसान की व्याख्या करने पर 

उत्तर मिल जायेंगे

तेली बना रहा है तेल 

लोहार चला रहा धौंकनी 

भले ही कंप्यूटर से हो रहा हो यह अब 


कचरा साफ कर रहे हैं भारत के लाल 

ईंट के भट्ठे धधक रहे हैं

हर गाँव कस्बो में

उससे अधिक उबाल मार रहा है

उन लोभियों का लोभ 

जो ईंट और अट्टालिका के व्यवसायी हैं


गँगा को रखकर एक तरफ 

सीवरेज में डुबकी लगा रहे हैं कितने ही लोग 

दारू में डुबकी लगाकर 

सपना लिए परिवार की खुशहाली का 

रोजगार चला जायेगा की धमकी से घबराकर 


गँगा में डुबकी से पाप धुल जायेंगे 

को दरकिनार कर 

जिन्दगी के सागर को पार करने की 

चिंता में खोए हैं


काँवर जैसी बेअर्थ यात्रा को देकर विस्तार 

भारत पिता और माँ भारत को

तीरथ करवाना छोड़

जीवन को अरथ देने का काम 

कर रहे हैं मजदूर 

दाँव पर लगाकर जिन्दगी को

अपने चिंतन-उस्तरे की धार को

वक्त के नाई कर रहे तेज हैं

नागरिकता के सौंदर्य ही नहीं

स्वास्थ्य के लिए भी


सूतक का जमाना तो चला गया

पर सँकट बना हुआ है

अभी भी अज्ञान-अंधविश्वास के रँगीन धागे 

बांध ही रहे हैं नासमझ पाँड़े 


पण्डित से लिया सवासेर गेहूँ 

सात पीढ़ी पहले वापस कर चुके हैं

इसलिए अब बेगार में भूखे पेट 

पाण्ड़े का ठूँठ फाड़ने की जरूरत नहीं रही

हाँ अक्ल की आरी जरूर रखना पास अपने

जिससे अन्याय-शोषण को

सामने आते ही चीर सको


पुस्तक की रोशनी संजोए रखना 

क्योंकि आँखें तो सभी को मिलती है जन्म से

पर आँख वाला ही भटकता है जीवन भर 

अंधे तो खाना-सोना 

कुछ एक-दो कामों की सीमित यात्रा में

पूरी कर लेते हैं जीवन-यात्रा


हजारों रोशनी और सत्य की जरूरत है आँखों को

जिन्हें देती हैं पुस्तकें

परेड में शामिल होना 

जीवन की गति में बने रहना है

परेड में थका आदमी 

जीवन की लाइन से 

बेदखल कर दिया जाता है ।

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देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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