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व्यंग्य : मितव्ययिता राग - मनमोहन चौरे , भोपाल


 व्यंग्य : 

मितव्ययिता राग 

         जैसे संगीत सम्राट तानसेन के राग मल्हार छेड़ते ही आसमान में काले काले बादल उमड़ने घुमड़ने,बरसने लगते थे,वैसे ही चुनाव जीतते ही नेताओं के मन में मंत्री पद की अभिलाषा उमड़ने लगती है। किन्तु  मितव्ययिता का राग छिड़ते ही कई मंत्रियों के मंसूबों पर तुषारापात हो गया। मंत्रियों को मितव्ययिता अपनाते हुए खर्च कटौती का कड़वा डोज दे दिया गया था। 

          पहले तो कई मंत्रियों ने नाक भौंह सिकोड़ी। वर्षों की ऐशो आराम की आदतें क्या ऐसे ही चली जायेंगी? मंत्री पद की धौंस भी दिखाई। केन्द्र के मंत्री हैं आखिर। क्या आम लोगों के साथ सफर करेंगे।

          लेकिन जब अभियान की शुरुआत बड़े बड़े नेताओं ने एकानामी क्लास और रेल से सफर करके कर दी हो तो किसकी औकात जो इसका विरोध कर सके।

          आजादी के बाद से ही कई लोग मंत्रियों के ठाट बाट देख कर ईर्ष्या करते थे और मन मसोस कर रह जाते थे।सोचते थे ऐसे भाग्य हमारे कहाँ? सुसज्जित बंगलों में रहना, बड़ी बड़ी गाड़ियों में घूमना, सुरक्षा में लगे सिपाहियों का सेल्यूट मारना,सरकारी खर्च पर विदेश यात्रा करना, पाँच सितारा होटलों में डिनर करना देख कर हर आम ओ खास के मन में एक बार मंत्री पद पाने का सपना पलता था। 

          मितव्ययिता राग से बौखलाये मंत्रियों की अपनी दलीलें थी। कितने वर्षों तक मेहनत करने और पार्टी के प्रति वफादारी के बदले मंत्री पद मिला है। इसे पाने के लिए जाने कितने मंदिरों के घंटे बजाये और माथा टेका। कितने साधु संतों के पैर दबाये। कितने तांत्रिकों को मस्का लगाया। सारी मेहनत पर एक ही झटके में पानी फेर दिया। 

          यदि मितव्ययिता की ये बात पहले पता चल जाती तो इनमें से कई नेता तो चुनाव ही नहीं लड़ते। लड़ते भी तो हार जाते और गलती से जीत भी जाते तो मंत्री कदापि नहीं बनते।

          मितव्ययिता अभियान की शुरुआत होते ही हमारे मंत्री जी को दिल का दौरा पड़ गया।समर्थकों ने भी भारी मितव्ययिता के पैरोकार होने का परिचय दिया और मंत्रीजी को खटिया पर डालकर ले जाकर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में भर्ती करा दिया।

          अस्पताल के जनरल वार्ड में लेटे मंत्रीजी का बदबू के कारण बुरा हाल हो गया और उन्हें दूसरा दौरा आते आते बचा। डाक्टर अपने निर्धारित समय से लगभग आधा घंटे की देरी से अस्पताल पहुँचे। जब कारण जानना चाहा तो बताया गया कि मितव्ययिता अभियान के समर्थन में वे आजकल कार के बजाए पैदल ही आते जाते हैं इस कारण देर से पहुँचते हैं।

          मंत्रीजी को आई.सी.यू. की याद सताने लगी। साथ आये समर्थक ने दूसरा पंखा भी चला दिया। तभी नर्स आई और दोनों पंखे बन्द कर दिये और बोली- आपको पता नहीं है कि मितव्ययिता अभियान चल रहा है। व्यर्थ बिजली जलाना मना है। फिर मंत्रीजी को तीसरा अटैक आते आते बचा।

          मंत्रीजी के पसीने छूट रहे थे। बदबू  के मारे परेशान थे। बोले- इस नर्क से मुझे बचाओ।वापस बंगले पर ही ले चलो। इस बदबू  से तो छुटकारा मिलेगा। 

          बंगले पहुँच कर मंत्रीजी ए.सी. में राहत की श्वास लेने ही वाले थे कि मितव्ययिता का करंट लगा और बिजली गुल हो गई।

- मनमोहन चौरे , भोपाल

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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