काव्य :
सदा गुण देखो दूजे के
सदा गुण देखो दूजे के,जीवन खुशियों से भर लेना।
अपना कर अपने जीवन में, जन्म सफल तुम कर लेना।
प्यार को प्यार से बांँटो तुम, नफ़रत किसी से मत करना।
सुकून से जीवन जीना है तो,सुकून किसी का मत छीनना।
ईमानदारी से जीना जीवन, बेईमानी कभी भी मत करना।
जो भी मिले संतोष से रहना, ईर्ष्या किसी से मत करना।
भला किसी का कर न सको तो, बुरा किसी का मत करना।
अपने दिल में बुराई तलाश कर, दूजे की बुराई मत करना।
फूलों को देखकर फूलों तुम,अपनी सफलता पर मत फूलना।
कांँटों की बाड़ को काटो तुम,किसी राह में कांँटा मत बनना।
गुस्से को गुच्छा करके फेंको तुम,अपने गुस्से में मत जलना।
जल की तरह शीतल ही रहो, दूसरे का देखकर मत जलना।
दुःख में साथी बनो सभी के, दुःखी किसी को मत करना।
धन से भले धनी हो तुम, कभी दिल से निर्धन मत बनना।
बुराई का बूरा(चुरा) कर डालो,कभी बुरे की संगत मत चढ़ना।
चढ़ सको तो गीर ही चढ़ना,कभी अपनी नजरों में मत गिरना।
नेकी की राह पर चलकर , जीवन को रंगीन कर लेना।
बन फरिश्ता इस जग में मुथा, लोगों में खुशियांँ भर देना।
- कवि छगनलाल मुथा-सान्डेराव ,मुम्बई
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