व्यंग्य :
बेबी को बेस पसंद है
- विवेक रंजन श्रीवास्तव
स्वतंत्र लेखक व्यंग्यकार
कल शाम मैं एक संगीत संध्या में गया। उम्मीद थी कि वहां हारमोनियम की धौंकनी से निकलती हुई रूहानी सांसें सुनाई देंगी और तबले की थाप पर कोई कलाकार अपनी उंगलियों का जादू दिखाएगा। पर वहां का नजारा कुछ और ही था। मंच पर हारमोनियम, तबला और ढोलक गायब थे । उनकी जगह कुछ चमचमाते काले इलेक्ट्रॉनिक डिब्बे और ढेर सारे उलझे हुए तार बिछे थे।
मुझे लगा शायद बिजली विभाग वालों ने मंच पर कब्ज़ा कर लिया है, पर जल्द ही पता चला कि ये आज का ‘आधुनिक की बोर्ड संगीत’ है।
सुरों के सरताज हारमोनियम की विदाई हो चुकी है । उसे सरस्वती प्रतिमा के बाजू में दीप प्रज्ज्वलन वाली टेबल पर सुस्थापित कर संगीतकारों ने हारमोनियम के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर दी है। अब ‘सस्टेन पेडल’ का स्वैग है। हारमोनियम, जो कभी महफिलों की जान हुआ करता था, आज कल पुरानी पेटी में बंद , कबाड़खाने में अपनी किस्मत पर रो रहा होगा। वह हारमोनियम, जिसे बजाते समय कलाकार का कंधा और कलाई दोनों कसरत करते थे, अब एक स्लीक से ‘सिंथेसाइजर’ में सिमट गया है। अब कलाकार को सुर पकड़ने के लिए मेहनत नहीं करनी पड़ती । बस एक बटन दबाया और तेज सुरमई आवाज़ ने पूरे पंडाल को हिला दिया।
अब उंगलियों का वह लचीलापन नहीं दिखता, बस एक उंगली से 'ऑटो-ट्यून' सेट है। हारमोनियम की सांसें, जो गायक के सुर के साथ घटती-बढ़ती थीं, अब बिजली के प्लग के भरोसे हैं। अगर लाइट कट जाए, तो महफिल की रूह वहीं दम तोड़ सकती है।
तबले की वह 'घिस' और ढोलक की वह 'चांटी' अब लुप्तप्राय प्रजातियां बन चुकी हैं। पुराने उस्ताद शो से पहले जो बीस मिनट छोटी हथौड़ी से तबले की रस्सियां कसा करते थे, वह हिस्ट्री है। पहले तबले वाला जब अपनी थाप से गायक को चुनौती देता था, तो श्रोताओं की गर्दन खुद-ब-खुद हिलने लगती थी। अब तो एक पेन-ड्राइव आती है, उसे मशीन में ठूंसा और 'धिन-धिन-धा' का एक ऐसा अंतहीन लूप शुरू होता है जिसे न थकान होती है, न पसीना बहता है।
बेचारे ढोलकिए जो कभी शादियों और महफिलों में पूरी ताकत झोंक देते थे, अब स्टेज के पीछे खामोश खड़े होकर सोच रहे होंगे कि क्या उनकी जगह ये बिजली के तार और प्लास्टिक के पैड लेंगे? ढोलक की वह लकड़ी की गूंज अब 'डिजिटल साउंड' के शोर में कहीं खो गई है।
संगीत में परिवर्तन का 'करंट' बह निकला है।
अब संगीत साधना नहीं, बल्कि 'सॉफ्टवेयर अपडेट' का विषय बन गया है। पहले रियाज़ होता था, अब 'प्री-सेट' लोड होते हैं। पहले सुर गले से निकलता था, अब 'प्रो-टूल्स' से निकलता है। कराओके ट्रैक पर सुरों की आजमाइश है। मुझे तो डर है कि कहीं वो दिन न आ जाए जब स्टेज पर कलाकार भी न दिखे और बस एक लैपटॉप रखा हो, जो खुद ही तालियां मांग ले और खुद ही 'वन्स मोर' का शोर मचा दे। "जब तक तार जुड़े हैं, तब तक सुर हैं, जैसे ही फ्यूज उड़ा, संगीत का मोक्ष हो गया।"
यह डिजिटल बदलाव शायद समय की मांग है, पर इस शोर में वह संगीत की सोंधी खुशबू गायब है जो तबले की स्याही और ढोलक की खाल से आती थी। हमने संगीत को 'फास्ट फूड' जैसा तो बना दिया, लेकिन वह 'स्वाद' कहीं खो गया जो घंटों के रियाज़ के बाद मंच पर चासनी सा रस वर्षा करता था। खैर, अब हम भी क्या करें? अब तो कान भी 'डिजिटल' हो चुके हैं, जिन्हें सुर नहीं, बस 'बेस' (Bass) चाहिए! क्योंकि बेबी को बेस पसंद है।
- विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवा निवृत मुख्य अभियंता विद्युत मंडल
स्वतंत्र लेखक
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