लघुकथा :
क्षमा वीरस्य भूषणम
"पापा जी हम लोग जैन हैं न?"
"हां !तुम तो जानते हो फिर आज अचानक,,"पिता ने पुत्र के प्रश्न पर आश्चर्य किया।
"आज क्षमापना पर्व है ,,,क्या केवल हम ही मनाते हैं!"
"हां ,कह सकते हो,,क्षमा को भी एक पर्व के रूप में मनाते हैं हम,,जाने अनजाने की हुए भूलों और त्रुटियों के लिए हम कम से कम एक दिन तो निर्धारित कर क्षमा मांगते हैं!
"तो क्या और कोई धर्म वाले भूल नहीं करते?"
"करते हैं अवश्य ,,पर या तो उनको स्वीकार नहीं कर पाते या इसका पश्चाताप करने की उत्तम मानसिकता से वो अभी दूर हैं,,तभी तो क्षमा को कहते हैं वीरस्य भूषणम,,मांगने वाला भी वीर और क्षमा करने वाला भी।"पिता ने विस्तार से स्पष्ट किया।
"क्या जब हम मांगते हैं क्षमा,, तो मिलती भी है या वो मन से हमें क्षमा नहीं कर पाते।"
"बेटा हमारे हाथ में उनका मानस बदलना नहीं,, किंतु हम अपने बोध और चित्त के अनुरूप,, बिना ग्लानि के, स्वस्थ मन से मुक्त होने की प्रक्रिया में संलग्न होते हैं!"
"पापा जब हम अपनी अनजाने में की गई भूलों की भी क्षमा चाहते हैं ,,तो सामने वाले व्यक्ति को ,हमारे साथ उसके व्यवहार की भी स्मृति हो आती होगी। है न!"
"हो सकता है किंतु वो बिना क्षमा चाहे मुक्त तो नहीं हो पाता अपने उस कृत्य से,,एक पीड़ा उसे तो सालती होगी,, किंतु जो हमें व्यथित नहीं करती।क्यों है न अच्छी संस्कृति?
"अरे, मैं कैसे चूक गया आपसे क्षमा मांगने से ,,पूरे वर्ष भर मैंने कितनी ही बार अवज्ञा से आपको चोट पहुंचाई होगी।दिल तोड़ा होगा,,, मिच्छामि दुक्कड़म!"
"सुखी हो!"
- आर एस माथुर , इंदौर
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