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जिंदगी का स्वाद: शिकायतों के शोर से आत्मीयता के संगीत तक - - लक्ष्मी चौहान , देहरादून, उत्तराखंड


 

जिंदगी का स्वाद : शिकायतों के शोर से आत्मीयता के संगीत तक

 फीके पड़ते रंग और हमारा नजरिया

अक्सर हम अपनी जिंदगी की जटिलताओं, करियर की होड़ और भविष्य की अनिश्चितताओं में इस कदर उलझ जाते हैं कि हमें जीवन का हर रंग फीका नजर आने लगता है। हम एक ऐसी यांत्रिक दौड़ का हिस्सा बन जाते हैं जहाँ दिन शुरू होने से पहले ही थकान हावी हो जाती है। इस भागदौड़ में हम यह बुनियादी सत्य भूल जाते हैं कि यही रंग—चाहे वे संघर्ष की तपिश के हों या सफलता की शीतलता के—हमें उन रूहानी एहसासात से रूबरू कराते हैं, जिन्हें हम 'जीना' कहते हैं। जब हम जीवन को केवल एक जिम्मेदारी या बोझ समझने लगते हैं, तभी से जिंदगी से हमारी नाराजगी शुरू होती है और हम अपनी सबसे अनमोल पूंजी को उबाऊ बना लेते हैं।

दिखावा बनाम वास्तविकता

एक बड़ा ही चुभता हुआ सवाल लेखिका लक्ष्मी चौहान ने उठाया है: जब हम अपने शरीर को, अपने चेहरे को, बड़ी ही खूबसूरती से सजाते हैं, तो जिंदगी को खूबसूरत बनाने में इतनी आना-कानी क्यों करते हैं? हम घंटों आईने के सामने खुद को संवारने में बिता देते हैं ताकि दुनिया को अच्छे दिखें, लेकिन उस 'भीतर' की जिंदगी का क्या, जिसे केवल हम महसूस करते हैं? बाहरी श्रृंगार क्षणिक है, परंतु जीवन की आंतरिक सुंदरता वह स्थायी चमक है जो विपरीत परिस्थितियों में भी हमारे चेहरे पर मुस्कान बनाए रखती है।

शिकायतों का बोझ और जिंदगी की दरियादिली

हमें यह गहराई से समझना चाहिए कि जिंदगी हमसे कभी कुछ नहीं मांगती। वह एक निस्वार्थ प्रदाता है। यह हम ही हैं जो अपनी विफलताओं या अधूरी इच्छाओं का दोष जिंदगी के मत्थे मढ़ देते हैं। हम शिकायतों की एक लंबी फेहरिस्त तैयार रखते हैं, लेकिन क्या हमने कभी गौर किया है? इतनी शिकायतों, इतनी उपेक्षा और इतनी नाराजगी के बावजूद, जिंदगी हमसे कभी नाराज नहीं होती।

जिंदगी एक साये की तरह हमेशा हमारा साथ देती है। वह हर विफलता के बाद एक नई सुबह का सूरज दिखाती है। इसीलिए हमारा यह नैतिक फर्ज बनता है कि हम जिंदगी में थोड़ा सा खुशियों का तड़का लगा दें। जैसे एक सादा सा भोजन सही मसालों के स्पर्श से लजीज बन जाता है, वैसे ही जीवन को भी उत्साह, प्रेम और छोटी-छोटी खुशियों के साथ जीने से उसका असली स्वाद आता है।

कीमत और ईमानदारी का नियम

जिंदगी का एक कड़वा नियम यह भी है कि यह हमें 'मुफ्त' में कुछ नहीं देती। यहाँ मुफ्त का अर्थ है कि बिना प्रयास और बिना भावना के प्राप्त की गई वस्तु की कोई कीमत नहीं होती। हमें जिंदगी के प्रति ईमानदार रहना पड़ता है। हम अक्सर वह पा लेते हैं जो हम चाहते हैं, पर उसे पाकर भी खुश नहीं होते। यह हमारे भीतर की एक गहरी विसंगति है। हम एक पल के लिए भी यह नहीं सोचते कि अगर यह जिंदगी, यह सांसें हमसे रूठ जाएं, तो हमारा क्या अस्तित्व रह जाएगा?

जिंदगी से दोस्ती: एक अनिवार्य समझौता

हमारा परम फायदा इसी में निहित है कि हम जिंदगी से दोस्ती कर लें। माना कि जिंदगी को पूरी तरह समझना एक कठिन पहेली जैसा है, लेकिन यह नामुमकिन बिल्कुल नहीं है। जीवन की पाठशाला में हमें कई कठिन परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। ये परीक्षाएं हमें तोड़ने के लिए नहीं, बल्कि हमें तराशने के लिए आती हैं। इन परीक्षाओं में सफल होना इसलिए जरूरी है ताकि हम जीवन की इस लंबी दौड़ में न केवल टिके रहें, बल्कि एक मिसाल कायम कर सकें।

अनुभव की कसौटी

जिंदगी को समझने के लिए किसी भारी-भरकम डिग्रियों की आवश्यकता नहीं होती; आपके अपने अनुभव ही सबसे बड़े शिक्षक होते हैं। बस जरूरत है तो इस बात की कि आप अपनी जिंदगी को समझें और उसे हर बार एक नया मौका दें। अपनी गलतियों से सीखें और फिर से खड़े हों। यह याद रखना बहुत जरूरी है कि:

जिंदगी हमारी मोहताज नहीं होती।

बल्कि, हम ही जिंदगी के मोहताज होते हैं।

हमारा वजूद, हमारी पहचान और हमारा होना, सब इसी जिंदगी की बदौलत है। इसलिए, शिकायतों के पुराने पन्नों को फाड़कर फेंक दें और जिंदगी को एक पुराने बिछड़े दोस्त की तरह गले लगा लें।

निष्कर्ष

जब आप जिंदगी के साथ कदमताल करना शुरू करेंगे, जब आप इसके हर कड़वे-मीठे स्वाद को बिना किसी बनावट या 'मिलावट' के स्वीकार करेंगे, तब आपको एहसास होगा कि यह कितनी अनमोल है। यकीन मानिए, जिस दिन आप जिंदगी से दोस्ती कर लेंगे, उस दिन से न केवल आपकी दुनिया बदलेगी, बल्कि आपको यह जिंदगी पहले से कहीं ज्यादा हसीन और मुकम्मल लगने लगेगी।

 - लक्ष्मी चौहान ,  देहरादून, उत्तराखंड

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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