ad

भारत से बाहर शक्ति पीठ - विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल


 भारत से बाहर शक्ति पीठ 

 - विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल 

       हमारी संस्कृति में देवी आदि शक्ति की आराधना के लिए इक्यावन शक्ति पीठों को सबसे पवित्र और ऊर्जावान स्थल माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब भगवान शिव सती के पार्थिव शरीर को लेकर ब्रह्मांड में तांडव कर रहे थे, तब सृष्टि को प्रलय से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के टुकड़े किए थे। माता के अंग, आभूषण और वस्त्र जिन स्थानों पर गिरे, वे सभी स्थान शक्ति पीठ कहलाए। तंत्र चूड़ामणि और अन्य ग्रंथों के अनुसार इन इक्यावन शक्ति पीठों में से बयालीस शक्ति पीठ वर्तमान भारत की भौगोलिक सीमाओं के भीतर स्थित हैं।

 शेष नौ शक्ति पीठ आज के भारत से बाहर पांच देशों में फैले हुए हैं। समय के चक्र और भूगोल के बदलने से भले ही आज भारत की राजनीतिक सीमाएं बदल गई हों, लेकिन इन शक्ति पीठों की आध्यात्मिक चेतना अखंड है जो प्राचीन अखंड भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक व्यापकता की गवाही देती है। 

इन महाशक्ति पीठों में से कुछ स्थल तो ऐसे परम कल्याणकारी हैं जहां शिव और शक्ति का साक्षात मिलन होता है, यानी वहां शक्ति पीठ के साथ ही भगवान शिव के परम पावन ज्योतिर्लिंग भी स्थापित हैं। आंध्र प्रदेश के नल्लामाला जंगलों के बीच कृष्णा नदी के तट पर बसा श्रीशैलम इसका सबसे अद्भुत उदाहरण है, जहां माता भ्रामराम्बा शक्ति पीठ के साथ भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक मल्लिकार्जुन स्वामी ज्योतिर्लिंग एक ही परिसर में विराजमान हैं। इसी तरह झारखंड के देवघर में स्थित बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग परिसर में ही जय दुर्गा शक्ति पीठ स्थित है, जिसे माता का हृदय पीठ माना जाता है। 

मध्य प्रदेश के उज्जैन में बाबा महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के ठीक पास में ही हरसिद्धि माता शक्ति पीठ स्थापित है, जहां देवी सती की कोहनी गिरी थी। 

ये ऐसे दुर्लभ धाम हैं जहां एक ही स्थान पर जाकर भक्तों को शिव और शक्ति दोनों की सम्मिलित असीम ऊर्जा की अनुभूति होती है।


पड़ोसी देश बांग्लादेश में भारत से बाहर सबसे अधिक  शक्ति पीठ स्थित हैं, जिनकी संख्या कुल चार मानी जाती है। इनमें सबसे प्रमुख सुगंधा शक्ति पीठ है, जो बाकरगंज के शिकारपुर गांव में सुगंधा नदी के तट पर स्थित है। यहां माता का नासिका भाग गिरा था और उन्हें सुनंदा नाम से पूजा जाता है। इसके अलावा सिलहट जिले के जैनपुर में माता की ग्रीवा गिरने से महालक्ष्मी शक्ति पीठ स्थापित हुआ, जो आज भी दुनिया भर के भक्तों की अगाध आस्था का केंद्र है। 

खुलना जिले के भवानीपुर में माता की बाईं पायल गिरने से अपर्णा शक्ति पीठ और जैसोर में माता की बाईं हथेली गिरने से यशोरेश्वरी शक्ति पीठ का वास माना जाता है।

 ये सभी स्थान आज भी बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय और सीमा पार से आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए असीम श्रद्धा का केंद्र बने हुए हैं।


अध्यात्म और हिमालय की गोद में बसे नेपाल में भी माता के अत्यंत पवित्र दो शक्ति पीठ स्थित हैं। काठमांडू में प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर के पास बागमती नदी के तट पर गुह्येश्वरी शक्ति पीठ है, जहां माता सती के दोनों घुटने गिरे थे। इस स्थान को तंत्र साधना के लिए बेहद शक्तिशाली माना जाता है और यहां माता की मूर्ति की जगह एक जलकुंड की पूजा होती है। 

नेपाल के ही पोखरा में मुक्तिनाथ मंदिर के समीप गंडकी नदी के उद्गम स्थल पर गंडकी शक्ति पीठ स्थित है, जहां माता का दाहिना गाल गिरा था। शालिग्राम पत्थरों के लिए प्रसिद्ध इस पावन क्षेत्र में वैष्णव और शाक्त दोनों ही संप्रदायों के लोग बड़ी श्रद्धा के साथ शीश नवाते हैं।


भारत के सुदूर उत्तर-पश्चिम की बात करें तो वर्तमान पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में स्थित हिंगलाज माता का मंदिर सबसे दुर्गम और चमत्कारी शक्ति पीठों में गिना जाता है। मरुस्थलीय पहाड़ियों के बीच हिंगोल नदी के तट पर स्थित गुफा में माता का ब्रह्मरंध्र यानी सिर का ऊपरी भाग गिरा था। इस पीठ को कोट्टरी शक्ति पीठ भी कहा जाता है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि स्थानीय मुस्लिम आबादी भी इस स्थान के प्रति गहरी आस्था रखती है और वे माता को नानी का हज कहकर पुकारते हैं। हर साल अप्रैल के महीने में यहां एक विशाल मेला लगता है, जिसमें पाकिस्तान के कोने-कोने से हिंदू और मुस्लिम दोनों ही माता के दर पर मन्नतें मांगने आते हैं।

हमारे दक्षिण में स्थित द्वीप देश श्रीलंका में भी माता की उपस्थिति का अमिट प्रमाण मिलता है। श्रीलंका के जाफना में नल्लूर नामक स्थान पर इंद्राक्षी शक्ति पीठ स्थित है, जिसे नगापोशानी अम्मन मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। माना जाता है कि इस स्थान पर माता सती के पैरों के आभूषण यानी नूपुर गिरे थे। रामायण काल से जुड़े इस द्वीप पर स्थित यह शक्ति पीठ तमिल और सिंहली दोनों ही संस्कृतियों के बीच सामंजस्य का प्रतीक है और यहां की अनूठी वास्तुकला भक्तों को मंत्रमुग्ध कर देती है।

उत्तर की ओर तिब्बत के पठार पर स्थित पवित्र मानसरोवर झील के तट पर भी एक अत्यंत प्रभावशाली शक्ति पीठ मौजूद है। कैलाश पर्वत की परिक्रमा के मार्ग में आने वाले इस स्थान पर माता सती का दायां हाथ गिरा था, जिसे मानसा शक्ति पीठ या दक्षायणी पीठ कहा जाता है। अत्यंत विषम जलवायु और अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित होने के बावजूद इस पीठ के दर्शन करना हर सनातनी के लिए जीवन का परम सौभाग्य माना जाता है। इस प्रकार ये सभी विदेशी शक्ति पीठ भौगोलिक सीमाओं को लांघकर आज भी पूरी दुनिया को एक ही आध्यात्मिक सूत्र में पिरोए हुए हैं।

विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

Post a Comment

Previous Post Next Post