काव्य :
शिरीष
जेठ की प्रचण्ड
अगन में
पत्थर पिघलते
देखा है
तपते रेगिस्तान में
शूल को जलते
देखा है
कोमल-गात शिरीष
मगर तुझे
लू -आँधी के प्रचण्ड
वेग में भी
शाखाओं पर
इठलाते, अठखेलियाँ
करते देखा है।
है मौन अवधूत
सुख-दुःख में
एक समाना,विरक्त
लोभ-मोह से
अचल,अडिग,निष्प्रभ
अनासक्त रह
जीने की कला
सिखलाता है,
हाँ जिजीविषा की
असीम लालसा
होते भी
नव-पल्लव आने पर
त्याग देह देता है।
- डा.नीलम , अजमेर
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