आलेख :
कृत्रिम बुद्धि और रचनात्मक लेखन
— विवेक रंजन श्रीवास्तव
(वरिष्ठ आलोचक, व्यंग्यकार एवं मानद हिंदी संपादक, ई-अभिव्यक्ति पोर्टल)
मानव सभ्यता का इतिहास मूलतः उसके द्वारा निर्मित और उपयोग किए गए उपकरणों के क्रमिक विकास का जीवंत दस्तावेज़ है। लेखन की कला भी इस तकनीकी विकास से अछूती नहीं रही। एक समय था जब मनुष्य ने ताड़-पत्रों और भोजपत्रों पर नुकीली कलमों से अपनी अनुभूतियों को उकेरा था । वह युग धैर्य और श्रम का था। वाल्मीकि ने रामायण और व्यास ने महाभारत इसी श्रमसाध्य पद्धति से लिखे । तत्पश्चात कागज और स्याही का दौर आया, जहाँ भर्रु, निब वाली कलम, स्याही की दवात और फिर इंक-पेन ने लेखन को एक नई गति दी।
बाल पॉइंट या डॉट-पेन के आविष्कार ने स्याही भरने की कठिनाई को समाप्त किया। प्रेमचंद, निराला और महादेवी वर्मा की पीढ़ी ने इन्हीं सरल साधनों से हिंदी साहित्य को अमर कृतियाँ दीं।
टाइपराइटर ने लेखन को एक व्यावसायिक गति तथा समरूप स्वरूप प्रदान किया । समाचारपत्रों और प्रकाशन जगत में यह क्रांति थी। कंप्यूटर के आगमन और उसमें 'कॉपी-पेस्ट' जैसी सुविधाओं ने संपादन और संशोधन को इतना सरल बना दिया कि लेखक घंटों की मेहनत मिनटों में कर सकता था। गूगल आदि सर्च इंजन से वांछित जानकारी स्क्रीन पर एक क्लिक में सुलभ हो गई। आज यदि किसी लेखक को 'मुगल काल में हिंदी साहित्य' पर शोध करना हो, तो उसे सरकारी पुस्तकालयों की धूल भरी अलमारियों में महीनों नहीं भटकना पड़ता। विकी पीडिया , अनेकों ई ग्रन्थालय की पी डी एफ पुस्तकों को हम अपनी टेबल पर पढ़ सकते हैं।
कृत्रिम मेधा (Artificial Intelligence) लेखन की इसी विकास यात्रा का अगला और अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव है। जैसे इन विभिन्न उपकरणों से लेखन की सामर्थ्य उन्नत हुई, वैसे ही एआई आज एक परिष्कृत लेखन उपकरण की भांति हमारे सामने है।
इस लेखन में मौलिकता का प्रश्न प्रायः उठाया जाता है। मेरा मानना है कि यह सुविधा एक उपकरण मात्र है, आखिर हम जो भी लिखते हैं उसकी प्रेरणा कहीं से तो लेते ही हैं। बरसों पहले पढ़ा या अनुभव किया गया किसी घटना का कोई दृश्य जिसका कॉपीराइट उनसे संबंधित लोगों का माना जा सकता है, आज हमारी लेखनी से नव सृजन करता ही है।
आज इंटरनेट रील आदि के ढेरों कंटेंट ऐसे हैं जिन पर किसी की कहानी का कोई कापी राइट नहीं है,
वे ए आई जनरेटेड कटेंट हैं।
दुनिया भर में कई कई लोग अपने अपने तरीके से इन्हें पुनरुत्पादित कर रहे हैं।
मूल रूप से इस तरह के वीडियो अक्सर 'स्क्रिप्टेड सोशल ड्रामा' होते हैं जो किसी एक विशिष्ट साहित्यिक लेखक की रचना के बजाय डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स, अंतरराष्ट्रीय मोटिवेशनल कंटेंट चैनल द्वारा बनाए गए होते हैं , उनका उद्देश्य यू ट्यूब आदि सोशल मीडिया से आर्थिक लाभ प्राप्त करना होता है। ये वीडियो विश्व भर में अरब की संख्या में भिन्न भिन्न भाषाओं में तरह तरह से प्रस्तुत होते हैं।
मेरा अभिमत यही है कि ए आई हमारी लेखन कला के विस्तार के लिए एक उपकरण है और उसका उपयोग किया जाना चाहिये ।
सच तो यह है कि एआई रचनात्मकता को मारता नहीं, बल्कि उसे व्यापकता और विस्तार देता है। यदि रचनाकार के भीतर अपने पात्रों के प्रति गहरी सहानुभूति और प्रतीकों की समझ हो ।
ए आई के उपयोग की समुचित कला सीखकर हमारे कच्चे और अनगढ़ विचारों के रत्न को तराशकर एक 'फिनिश्ड डायमंड' बनाने में ए आई कुशल सह-लेखक बन सकता है।
जैसे किसी महान संगीतकार को एक उत्कृष्ट वाद्ययंत्र मिल जाए , तो संगीत और धुन की आत्मा संगीतकार की होती है, यंत्र केवल उसे स्वर देता है।
मेरी समझ में कृत्रिम बुद्धि साहित्यकारों के लिए एक 'वरदान' है । यह मशीनी नहीं, बल्कि 'मानवीय लेखकीय संवेदनात्मक बुद्धिमत्ता' का व्यापक और आधुनिक विस्तार है।
बोइंग 787 का ऑटोपायलट सिस्टम चाहे कितना भी परिष्कृत हो , उसका नियंत्रण अंततः एक अनुभवी पायलट के पास ही होता है। एआई लेखन यात्रा का 'सह-पायलट' मात्र बनाया जा सकता है ।
एआई कभी भी मूल लेखक नहीं बन सकता, क्योंकि वह स्वयं 'अनुभव' नहीं कर सकता। 'साहित्यिक सरोकार' किसी डेटाबेस में नहीं होते, बल्कि जीवन की तपस्या में मिलते हैं।
जब महाकवि निराला ने 'तोड़ती पत्थर' लिखा, तो उस कविता में एक श्रमिक स्त्री का पसीना, धूप की तपिश और सामाजिक यातना की जो अनुभूति है , वह किसी एल्गोरिदम से नहीं उपजी थी, उपजाई भी नहीं जा सकती। वह निराला के जीवन के संघर्ष और वैयक्तिक अनुभव से उपजी थी। एआई बस उस तपस्या को दुनिया तक पहुँचाने का एक तीव्रगामी माध्यम बन सकता है।
भविष्य उसी लेखक का है जो अपनी 'संवेदना' और एआई की 'व्यापकता' के बीच एक आदर्श संतुलन स्थापित कर पाएगा।
जैसे नदी और किनारे मिलकर एक समृद्ध तट बनाते हैं । नदी की गहराई संवेदना है और किनारे की दृढ़ता एआई की तकनीक कही जा सकती है। इन दोनों के संगम से जो साहित्य उत्पन्न होगा, वह न केवल मर्मस्पर्शी होगा, बल्कि व्यापक, तथ्यपूर्ण और वैश्विक स्तर पर प्रभावशाली भी होगा। यह संगम ही भविष्य के हिंदी साहित्य की नई पहचान होगी। मैं निसंकोच अपने लेखन में ए आई का एक उपकरण के रूप में उपयोग करने का प्रयत्न कर रहा हूं । यद्यपि यह नवीन उपकरण एक महासागर सा लगता है, और मैं एक शिशु सा इसे सीखने का यत्न कर रहा हूं।
- विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, विद्युत मंडल | स्वतंत्र लेखक एवं आलोचक
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