रक्तदान और मानवता: सेवा, संवेदना तथा समर्पण का संगम
- डाॅ . राकेश सक्सेना , एटा
मानव सभ्यता का विकास भौतिक उपलब्धियों का इतिहास नहीं, परोपकार, सहयोग और मानवीय संवेदनाओं का भी इतिहास है। मनुष्य को अन्य जीवों से अलग करने वाली उसकी करुणा की प्रवृत्ति है जो दूसरों की पीड़ा समझती है, रिश्तों को गहरा बनाती है, समाज से जोड़े रखती है और इन्सान बनाए रखती है। दुर्घटना की घड़ी में जब कोई व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के परिचित अथवा अनजान व्यक्ति के जीवन की रक्षार्थ अपना रक्तदान करता है, उस समय वह मानवता के सर्वोच्च आदर्श का परिचय देता है।मानव हितार्थ भारतीय संस्कृति में अन्नदान, विद्यादान, जलदान, भूमिदान, रक्तदान की प्राचीन दान परम्पराएँ रहीं हैं, इनमें रक्तदान को जीवन-दान की संज्ञा दी जाती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा 14 जून ' विश्व रक्तदान दिवस ' घोषित किया गया था, जो आस्ट्रेलिया वैज्ञानिक कार्ल लैंडस्टाइनर की जयंती 14 जून, 1868 ई० के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इस आयोजन की शुरुआत सन् 2004 ई० में स्वस्थ व्यक्तियों द्वारा स्वेच्छा से और बिना किसी भुगतान के सुरक्षित रक्तदान की आवश्यकता के बारे में जनजागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से की गई थी। इसके बाद रक्त बैंकों की स्थापना हुई। भारत में रक्तदान दिवस 01 अक्टूबर को मनाया जाता है और स्वैच्छिक रक्तदान के महत्व के बारे में देश के नागरिकों को प्रेरित, प्रोत्साहित व जागरूक किया जाता है।
रक्तदान की अवधारणा मानवता और सहअस्तित्व की भावना पर आधारित है। इसमें दानकर्ता और प्राप्तकर्ता के बीच किसी भी प्रकार का जाति, धर्म, वर्ग, भाषा का सम्बन्ध आवश्यक नहीं होता। यह मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने वाला एक ऐसा मानवीय सेतु है, जिसमें केवल जीवन की रक्षा का उद्देश्य निहित रहता है। सामान्यत: एक स्वस्थ व्यक्ति से लगभग 350 से 450 मिलीलीटर रक्त लिया जाता है, जो कुल रक्त मात्रा का एक छोटा भाग होता है और कुछ ही दिनों में शरीर इस रक्त की पूर्ति कर लेता है। किसी भी दुर्घटना में घायल व्यक्ति, प्रसव संकट की घड़ी में महिला, थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चा अथवा गम्भीर शल्यक्रिया से गुजर रहा रोगी आदि अनेक स्थितियों में जीवन की रक्षा रक्तदान से ही सम्भव होती है, अत: रक्तदाता जीवन रक्षक की भूमिका निभाता है, आशा का संचार करता है। संवेदना की यह शक्ति ही दूसरों के कष्टों के प्रति मनुष्य को जागरूक बनाता है। ऐसे परोपकारी लोगों का प्रयास होता है कि उनके रक्तदान से किसी का जीवन बच जाए।
भारतीय संस्कृति दृष्टि से रक्तदान ' वसुधैव कुटुम्बकम ' की भावना पर आधारित है। हमारे यहाँ परोपकार को धर्म माना गया है। सज्जनों की सम्पत्ति और शक्ति दूसरों के उपकार के लिए होती है। यह सामाजिक समरसता का भी प्रतीक है। रक्त का कोई धर्म, जाति या भाषा नहीं होती। जब किसी रोगी को रक्त चढ़ाया जाता है तो यह नहीं देखा जाता कि दाता कौन था। आज लोकप्रियता के स्तर पर पहुँच कर रक्तदान अभियान के समक्ष जागरूकता की कमी, भ्रांतियाँ और अंधविश्वास, ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित सुविधाएँ, महिलाओं की भागीदारी का कम होना, नियमित रक्तदाताओं की कमी जैसी अनेक चुनौतियाँ भी हैं जिनका समाधान रक्तदान शिविरों में रक्तदाताओं का सम्मान और प्रोत्साहन से, सामाजिक आन्दोलन बनाकर, जागरूकता कार्यक्रमों से करने की आवश्यकता है।
अंतत: कहा जा सकता है कि रक्तदान मानवता का प्रभावशाली रूप है। यह सेवा का संस्कार, संवेदना का विस्तार और समर्पण की चरम अभिव्यक्ति है। रक्तदाता किसी परिचित- अजनबी के जीवन में प्रकाश बनकर आता है और प्रमाणित करता है कि ' परोपकाराय सतां विभूतय: ' जो व्यक्ति महान, उदार और सज्जन होते हैं वे अपनी सफलता, धन और विद्या का उपयोग केवल अपने स्वार्थ के लिए नहीं बल्कि दूसरों के कल्याण के लिए करते हैं।
- डाॅ०राकेश सक्सेना,
पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष,
68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001
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