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सोशल मीडिया के आईने में बिखरता आत्मविश्वास : जहाँ चमकती तस्वीरें अक्सर मन की शांति छीन लेती हैं - डॉ. रीटा अरोड़ा सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर , करनाल


 

आलेख :

सोशल मीडिया के आईने में बिखरता आत्मविश्वास : जहाँ चमकती तस्वीरें अक्सर मन की शांति छीन लेती हैं

     आज का समय अभूतपूर्व है। तकनीक ने दुनिया को हमारी उँगलियों तक पहुँचा दिया है। हम कुछ ही क्षणों में दुनिया के किसी भी कोने की खबर, तस्वीर या वीडियो देख सकते हैं। लेकिन इसी सुविधा के साथ एक अदृश्य संकट भी जन्मा है-आत्मविश्वास का संकट।

पहले तुलना का दायरा सीमित था। हम अपने पड़ोस, रिश्तेदारों या सहकर्मियों तक ही स्वयं की तुलना करते थे। किसी की नई कार, किसी का बड़ा घर या किसी का प्रमोशन देखकर मन में क्षणिक ईर्ष्या या असंतोष पैदा हो जाता था। लेकिन आज सोशल मीडिया ने तुलना के इस दायरे को अनंत बना दिया है।

अब हम हर दिन सैकड़ों लोगों की उपलब्धियाँ, यात्राएँ, उत्सव, सफलताएँ और मुस्कुराहटें देखते हैं। धीरे-धीरे हमारे मन में यह भ्रम बनने लगता है कि दुनिया के बाकी लोग हमसे अधिक सफल, अधिक खुश और अधिक संतुष्ट हैं।

यहीं से आत्मविश्वास में पहली दरार पड़ती है।

एक युवक सुबह उठते ही सोशल मीडिया खोलता है। किसी मित्र की विदेश यात्रा की तस्वीर सामने आती है। अगले ही पल किसी सहपाठी की पदोन्नति की खबर दिखाई देती है। थोड़ी देर बाद किसी प्रभावशाली व्यक्ति की आलीशान जीवनशैली का वीडियो दिखता है।

कुछ ही मिनटों में उसका मन अपनी उपलब्धियों को भूलकर दूसरों की उपलब्धियों का हिसाब लगाने लगता है।

उसे लगने लगता है कि शायद वह पीछे रह गया है।

वास्तविकता यह नहीं होती, लेकिन अनुभव वैसा ही महसूस होता है।

सोशल मीडिया की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वहाँ जीवन का सम्पूर्ण सत्य नहीं दिखता, केवल उसका चुना हुआ हिस्सा दिखता है। लोग अपने संघर्ष कम और अपनी सफलताएँ अधिक साझा करते हैं। असफलताओं की रातें अक्सर कैमरे से दूर रहती हैं, जबकि सफलताओं की सुबहें तस्वीर बनकर दुनिया के सामने आ जाती हैं।

पर देखने वाला इस अंतर को हमेशा नहीं समझ पाता।

उसे लगता है कि दूसरों का जीवन लगातार उत्सव है और उसका जीवन ही समस्याओं से भरा हुआ है।

धीरे-धीरे तुलना आदत बन जाती है और आदत असंतोष में बदल जाती है।

समस्या केवल तुलना तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया के पीछे काम करने वाले एल्गोरिदम हमारे व्यवहार को लगातार समझते रहते हैं। हम किस पोस्ट पर रुकते हैं, किस तस्वीर को ध्यान से देखते हैं, किस वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हैं-यह सब दर्ज होता रहता है।

फिर वही सामग्री हमें बार-बार दिखाई जाती है।

यदि कोई व्यक्ति दूसरों की सफलता देखकर अधिक देर तक स्क्रीन पर रुकता है तो उसके सामने और सफलता की कहानियाँ आने लगती हैं। यदि कोई अपनी आर्थिक स्थिति को लेकर चिंतित है तो उसे और महंगी कारें, बड़े घर और विलासितापूर्ण जीवनशैली दिखाई जाती है।

अनजाने में उसकी दुनिया ऐसी तस्वीरों से भर जाती है जो उसे यह विश्वास दिलाने लगती हैं कि उसका जीवन पर्याप्त नहीं है।

यहीं आत्मविश्वास टूटने लगता है।

आज स्थिति और भी जटिल हो गई है। अब सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली हर चीज़ वास्तविक नहीं होती। कई तस्वीरें फिल्टर से बदली जाती हैं, कई वीडियो सावधानीपूर्वक संपादित किए जाते हैं और कई बार कृत्रिम बुद्धिमत्ता ऐसी छवियाँ तैयार कर देती है जो वास्तविक लगती तो हैं, पर होती नहीं।

विडंबना यह है कि भले ही तस्वीरें कृत्रिम हों, उनसे पैदा होने वाली हीन भावना बिल्कुल वास्तविक होती है।

इसी कारण आज बहुत से लोग अपने जीवन की गुणवत्ता को वास्तविक अनुभवों से नहीं, बल्कि स्क्रीन पर दिखने वाले दृश्यों से मापने लगे हैं।

लेकिन समस्या सोशल मीडिया या तकनीक में नहीं है।

समस्या तब शुरू होती है जब हम दूसरों की झलकियों को अपने पूरे जीवन से तुलना करने लगते हैं।

हमें याद रखना चाहिए कि किसी की मुस्कुराती तस्वीर उसके जीवन का सम्पूर्ण सच नहीं होती। किसी की उपलब्धि हमारी असफलता का प्रमाण नहीं होती। किसी की समृद्धि हमारी कमी का संकेत नहीं होती।

हर व्यक्ति अपनी परिस्थितियों, संघर्षों और अवसरों के साथ जीवन की अलग यात्रा तय कर रहा है।

आत्मविश्वास तुलना से नहीं, आत्मस्वीकृति से जन्म लेता है।

संतोष दूसरों के जीवन को देखकर नहीं, अपने जीवन को समझकर आता है।

और मानसिक शांति तब मिलती है जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं कि जीवन कोई प्रतियोगिता नहीं, बल्कि एक व्यक्तिगत यात्रा है।

इसलिए कभी-कभी स्क्रीन से नज़र हटाकर अपने आसपास भी देखिए। अपने परिवार, अपने मित्रों, अपने अनुभवों और अपनी उपलब्धियों को पहचानिए। जो जीवन आपको साधारण लगता है, संभव है वही किसी और की आकांक्षा हो।

सोशल मीडिया का उपयोग कीजिए, लेकिन उसे अपने आत्म-मूल्य का पैमाना मत बनने दीजिए।

क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी सफलता दूसरों से आगे निकलने में नहीं, बल्कि स्वयं को स्वीकार करने और भीतर की शांति को बचाए रखने में है।

आख़िरकार, तस्वीरों की दुनिया क्षणिक होती है, लेकिन आत्मविश्वास की नींव वास्तविक जीवन में ही बनती है।


- डॉ. रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर

करनाल

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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