काव्य :
पत्थर...
पत्थर के कार्य अलग अलग
पत्थर से मूर्ति बने,
बने भगवान् और घर
पत्थर को तराश बने हीरे,
जवाहरात और हार,
पूजे गए भगवान्,
बने कइयों के पालनहार,
जड़े गए अंगूठी में, हार में,
रौनक आई गले में
कान में, नाक में, हाथ मे, पैरों में,
मुकुट में सजे गए
बहुत दर्द सहे तुमने,
पीटा गया तुम्हें बार बार
पर सदा सामने आया तुम्हारा निखार ,
भवन में, किलों में, महलों में
मंदिरों में, अट्टालिकाओं में,
देखते ही बनती है तुम्हारी खूबसूरती
हे पत्थर ...
तुमने भी छुपा कर रखें हैं,
कई अर्थ अपने भीतर,
कई मुहावरे अपने अंदर
कलेजे पर पत्थर रखना,
पत्थर की लकीर,
दिमाग मे पत्थर पड़ना,
पानी को पत्थर कर देना,
पत्थर पर सिर फोड़ना,
पत्थर पर सीजना,
पत्थर निचोड़ना आदि
आजकल तो आप
फैशन में भी हो,
सबके सिर चढ़ कर बोल रहे हो, किसी को किसी की बात
अच्छी ना लगी तो लगे बरसने,
किसी को किसी का धर्म
पसंद ना आया तो लगे बरसने,
किसी ने अपराध किया तो लगे बरसने, किसी को दंड दिया तो लगे बरसने,
सुनते ही आपका नाम
लगे लोग कांपने थर थर
भागने लगे इधर उधर
देख बावंडर रक्त की बह निकली धार
कर दिया लहू से श्रृंगार,
फिर भी थमा ना क्रोध का कहर,
तो बार बार, मार मार
सुला दिया चिर निद्रा में
एक जीवन का सफर
- बनानी "प्रेम"
नरसिंहपुर रोड
छिंदवाड़ा (मध्यप्रदेश)
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