विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष :
प्रकृति बचेगी, तो हम बचेंगे
कुछ संकट ऐसे होते हैं जो धीरे-धीरे आते हैं। वे अचानक दस्तक नहीं देते, बल्कि हमारी आदतों, हमारी सुविधाओं और हमारी अनदेखी के बीच चुपचाप अपना स्थान बना लेते हैं।
पर्यावरण संकट भी ऐसा ही एक संकट है।
नदियाँ एक दिन में प्रदूषित नहीं हुईं, जंगल एक दिन में समाप्त नहीं हुए और धरती का तापमान भी एक दिन में नहीं बढ़ा। यह उन लाखों छोटे-छोटे निर्णयों का परिणाम है, जिन्हें हमने विकास और सुविधा के नाम पर वर्षों तक सही मान लिया।
आज जब हम विश्व पर्यावरण दिवस मना रहे हैं, तब यह केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं है। यह अपने अस्तित्व से जुड़े एक गंभीर प्रश्न पर विचार करने का अवसर है-क्या हम आने वाली पीढ़ियों के लिए रहने योग्य पृथ्वी छोड़ पाएँगे?
कभी प्रकृति हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हुआ करती थी। गाँवों में पीपल और बरगद के वृक्ष केवल पेड़ नहीं थे, वे सामुदायिक जीवन के केंद्र थे। तालाब केवल जलस्रोत नहीं थे, बल्कि पूरे पारिस्थिति की तंत्र की धड़कन थे। ऋतुओं का क्रम जीवन की लय तय करता था और मनुष्य स्वयं को प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका एक हिस्सा मानता था। लेकिन पिछले कुछ दशकों में यह संबंध बदल गया।
हमने विकास को प्रकृति पर विजय के रूप में देखना शुरू कर दिया। जंगलों की जगह कंक्रीट ने ले ली, जलस्रोतों की जगह ऊँची इमारतों ने और खुले आसमान की जगह धुएँ की परतों ने।
आज स्थिति यह है कि जलवायु परिवर्तन केवल वैज्ञानिकों की चर्चा का विषय नहीं रह गया है। इसकी आहट हमारे दैनिक जीवन में स्पष्ट दिखाई देने लगी है। कभी असहनीय गर्मी, कभी असामान्य वर्षा, कभी बाढ़ तो कभी सूखा-प्रकृति हमें लगातार संकेत दे रही है कि संतुलन बिगड़ चुका है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने जिस “त्रिकोणीय ग्रहीय संकट” की बात कही है, वह वास्तव में मानव सभ्यता के लिए चेतावनी है। जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का ह्रास और प्रदूषण-ये तीनों संकट अलग-अलग नहीं हैं। वे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और हमारे भविष्य को प्रभावित कर रहे हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि हमने पर्यावरण को अक्सर एक संसाधन के रूप में देखा है, साझेदार के रूप में नहीं।
हम भूल गए कि पेड़ केवल लकड़ी नहीं देते, वे जीवन देते हैं। नदियाँ केवल पानी नहीं देतीं, वे सभ्यताओं को जन्म देती हैं। मिट्टी केवल फसल नहीं उगाती, वह जीवन का आधार तैयार करती है।
आज यदि हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, समुद्र का स्तर बढ़ रहा है और वन्यजीवों का अस्तित्व संकट में है तो इसका अर्थ केवल प्राकृतिक क्षति नहीं है। इसका अर्थ है कि मानव जीवन की सुरक्षा भी खतरे में है।
विश्व पर्यावरण दिवस 2026 का विषय है-“प्रकृति से प्रेरित। जलवायु के लिए। हमारे भविष्य के लिए।”
यह विषय हमें याद दिलाता है कि समाधान भी प्रकृति के भीतर ही छिपे हैं।
एक वृक्ष केवल छाया नहीं देता, वह कार्बन अवशोषित करता है, तापमान नियंत्रित करता है और जैव विविधता को संरक्षण देता है। आर्द्रभूमियाँ बाढ़ को नियंत्रित करती हैं। मैंग्रोव समुद्री तूफानों से सुरक्षा प्रदान करते हैं। वर्षा जल संचयन भूजल को पुनर्जीवित करता है।
अर्थात् प्रकृति कोई समस्या नहीं है, बल्कि समाधान का सबसे बड़ा स्रोत है।
लेकिन केवल सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। पर्यावरण संरक्षण का वास्तविक आंदोलन तब शुरू होगा जब यह हमारे दैनिक व्यवहार का हिस्सा बनेगा।
जब हम खरीदारी के लिए अपना थैला साथ लेकर जाएँगे।
जब हम आवश्यकता से अधिक संसाधनों का उपयोग नहीं करेंगे।
जब हम प्लास्टिक की सुविधा से अधिक पृथ्वी के भविष्य को महत्व देंगे।
जब हम अपने बच्चों को केवल पर्यावरण के बारे में पढ़ाएँगे नहीं, बल्कि प्रकृति से प्रेम करना भी सिखाएँगे।
आज आवश्यकता बड़े भाषणों से अधिक छोटे लेकिन निरंतर प्रयासों की है।
एक पौधा लगाना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है उसकी देखभाल करना।
पानी बचाने की बात करना आवश्यक है, लेकिन उससे अधिक आवश्यक है अपने व्यवहार में जल संरक्षण को शामिल करना।
पर्यावरण दिवस पर तस्वीरें साझा करना अच्छा है, लेकिन उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है वर्ष भर पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार बने रहना।
सच्चाई यह है कि पृथ्वी को हमारी आवश्यकता नहीं है। यदि मानव सभ्यता समाप्त हो जाए तो प्रकृति धीरे-धीरे स्वयं को पुनर्जीवित कर लेगी। लेकिन यदि प्रकृति का संतुलन नष्ट हो गया, तो मानव सभ्यता का अस्तित्व संभव नहीं रहेगा।
इसलिए पर्यावरण संरक्षण किसी एक दिन का अभियान नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका बनना चाहिए।
विश्व पर्यावरण दिवस हमें यही याद दिलाता है कि हम पृथ्वी के मालिक नहीं, उसके संरक्षक हैं।
आने वाली पीढ़ियाँ हमसे यह नहीं पूछेंगी कि हमने कितने बड़े भवन बनाए थे या कितनी आर्थिक प्रगति की थी। वे यह पूछेंगी कि क्या हमने उनके लिए स्वच्छ हवा, सुरक्षित जल और हरी-भरी धरती छोड़ी थी।
और शायद इसी प्रश्न का उत्तर तय करेगा कि हमने विकास किया था या केवल संसाधनों का उपभोग।
क्योंकि अंततः सत्य बहुत सरल है-
प्रकृति का संरक्षण कोई परोपकार नहीं है। यह हमारे अपने अस्तित्व की रक्षा का सबसे बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय है।
*प्रकृति बचेगी, तो हम बचेंगे।*
- डॉ. रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्ति एसोसिएट प्रोफेसर
करनाल
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