काव्य :
आग बरसती है सूरज से
धरती की छाती जलती है,
आग बरसती है सूरज से,
और झुलसता मानव तन भी,
जूझ रहा जलते मौसम से ।
न चाहा तपती धरती को,
न चाहा की प्राण जले,
न जल में गिरती किरणों से,
सागर सरिता यूं उबले।
सूख रहे पेड़ों के पत्ते,
सूख रही उनकी हर डाली,
पक्षी कहां ढूंढे अपना दर,
नीडो में भी जीवन खाली।
काट रहे हो जंगल सारा,
शहरों में भी पेड़ नहीं है,
फल है मानव के कर्मों का,
झेल रहे पर शर्म नहीं है।
उच्च तापमान,भीषण गर्मी,
लू से लपटे तेज हुई,
आग उगलती धरती भी,
गर्म तवे सी लाल हुई,
सुख था कितना याद करो तुम,
जब सुख के साधन ही कम थे ,
आंगन में खटिया का आनंद,
खुली हवा के झोंके नम थे।
खुली चांदनी हम सब छत पर,
हसी ठिठोली का था आलम,
नाना और नानी के घर पर,
गर्मी की छुट्टी का था मौसम।
कितना बदल गया है मौसम,
सुख की सांस न ले पाएं हम,
घुटन हो रही, हर एक तन में,
आओ पेड़ लगाएंगे हम।
- आदित्य हरि गुप्ता , सीहोर
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