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हमारी धरोहर : रीति-रिवाज, परम्पराएं और जीवन शैली - डॉ. रीटा अरोड़ा , करनाल


 

सामाजिक लेख : 

हमारी धरोहर : रीति-रिवाज, परम्पराएं और जीवन शैली

जड़ों से जुड़ी संस्कृति ही आने वाली पीढ़ियों को पहचान और दिशा देती है

एक दिन पार्क में टहलते हुए दो बुजुर्ग मित्र बातें कर रहे थे।

"शर्मा जी, आपका पोता विदेश से लौट आया?" वर्मा जी ने पूछा।

"हाँ, आ गया।" शर्मा जी मुस्कुराए।

"कैसा लगा उसे अपना देश?"

"यही तो सोच रहा हूँ। उसने कहा कि वहाँ की सड़कें, तकनीक और सुविधाएँ बहुत अच्छी हैं, लेकिन दादी के हाथ का खाना, त्योहारों की रौनक और घर के सब लोगों का साथ उसे सबसे ज़्यादा याद आता था।"

वर्मा जी कुछ देर चुप रहे। फिर बोले, "देखिए शर्मा जी, यही तो हमारी असली पूँजी है। इमारतें और मशीनें समय के साथ बदल जाती हैं, लेकिन संस्कार, परम्पराएँ और जीवन शैली पीढ़ियों तक चलती हैं।"

उनकी यह बात मन को छू गई।

वास्तव में किसी भी राष्ट्र की पहचान केवल उसकी आर्थिक शक्ति या आधुनिकता से नहीं होती। उसकी असली पहचान उसकी संस्कृति, उसके रीति-रिवाजों, उसकी परम्पराओं और जीवन मूल्यों से होती है। यही हमारी धरोहर है, जो हजारों वर्षों से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है।

भारत की संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध संस्कृतियों में गिनी जाती है। यहाँ अनेक भाषाएँ, वेशभूषाएँ, खान-पान और परम्पराएँ हैं, फिर भी सबको जोड़ने वाला एक अदृश्य सूत्र है - "अनेकता में एकता"।

हमारे रीति-रिवाज केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं हैं। इनके पीछे जीवन को व्यवस्थित, अनुशासित और सार्थक बनाने का उद्देश्य छिपा है। जन्म से लेकर मृत्यु तक हमारे जीवन में विभिन्न संस्कारों का विधान किया गया है। नामकरण, अन्नप्राशन, विद्यारंभ, विवाह और अंत्येष्टि जैसे संस्कार केवल सामाजिक आयोजन नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक चरण को सम्मानपूर्वक स्वीकार करने की प्रक्रिया हैं।

हमारे पूर्वज जानते थे कि जीवन केवल भौतिक उपलब्धियों का नाम नहीं है। इसलिए उन्होंने संस्कारों के माध्यम से व्यक्ति को परिवार, समाज और प्रकृति से जोड़ने का प्रयास किया।

भारतीय परिवार व्यवस्था भी हमारी अमूल्य धरोहर है। संयुक्त परिवार की परम्परा ने सदियों तक हमें सहयोग, त्याग और अपनत्व का पाठ पढ़ाया। दादा-दादी की कहानियाँ, माता-पिता के संस्कार और परिवार के बुजुर्गों का अनुभव जीवन की वह पाठशाला थी, जहाँ से चरित्र का निर्माण होता था।

आज भले ही परिवार छोटे होते जा रहे हों, लेकिन परिवार के महत्व को कोई नकार नहीं सकता। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में भी जब कोई संकट आता है, तो सबसे पहले व्यक्ति अपने परिवार की ओर ही देखता है।

हमारी संस्कृति में "अतिथि देवो भव:" का भाव भी विशेष महत्व रखता है। अतिथि का सम्मान करना, बड़ों का आदर करना और छोटे बच्चों को स्नेह देना केवल सामाजिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि हमारी जीवन शैली का हिस्सा है।

त्योहारों की बात करें तो भारत का सांस्कृतिक जीवन उत्सवों से भरा हुआ है। दीपावली, होली, रक्षाबंधन, ईद, क्रिसमस, गुरुपर्व, पोंगल और ओणम जैसे त्योहार केवल धार्मिक अवसर नहीं हैं। ये लोगों को जोड़ने, रिश्तों में मिठास घोलने और समाज में सामूहिकता की भावना पैदा करने का माध्यम हैं।

जब पूरा परिवार एक साथ बैठकर दीप जलाता है, रंग खेलता है या मिठाइयाँ बाँटता है, तब केवल त्योहार नहीं मनाया जाता, बल्कि रिश्तों को भी नया जीवन मिलता है।

हमारी भोजन संस्कृति भी हमारी पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत के हर क्षेत्र का अपना स्वाद, अपनी विशेषता और अपनी परम्परा है। भोजन हमारे यहाँ केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि प्रेम, आतिथ्य और संस्कृति की अभिव्यक्ति है।

इसी प्रकार हमारी लोक कलाएँ, लोक गीत, नृत्य और शिल्पकला भी हमारी सांस्कृतिक धरोहर के अनमोल रत्न हैं। राजस्थान का कालबेलिया नृत्य, पंजाब का भांगड़ा, गुजरात का गरबा, बंगाल के बाउल गीत और बिहार की मधुबनी कला हमारी विविधता और सृजनशीलता के जीवंत उदाहरण हैं।

दुर्भाग्य से आज वैश्वीकरण और तकनीक के इस युग में हमारी कई परम्पराएँ धीरे-धीरे पीछे छूटती जा रही हैं। युवा पीढ़ी आधुनिकता की ओर बढ़ रही है, जो आवश्यक भी है, लेकिन यदि आधुनिकता की दौड़ में हम अपनी जड़ों को भूल जाएँ, तो यह प्रगति अधूरी रह जाएगी।

समस्या आधुनिक बनने में नहीं है। समस्या तब होती है जब हम अपनी पहचान खोने लगते हैं।

मोबाइल और इंटरनेट हमें दुनिया से जोड़ सकते हैं, लेकिन वे दादी की कहानियों की जगह नहीं ले सकते। आधुनिक शिक्षा हमें ज्ञान दे सकती है, लेकिन संस्कार नहीं। आर्थिक समृद्धि सुविधाएँ दे सकती है, लेकिन आत्मीयता नहीं।

इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम आधुनिकता और परम्परा के बीच संतुलन बनाकर चलें। नई पीढ़ी को तकनीक के साथ-साथ अपनी भाषा, अपने त्योहारों, अपने रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक मूल्यों से भी जोड़ें।

क्योंकि जिस वृक्ष की जड़ें मजबूत होती हैं, वही आँधियों में भी खड़ा रहता है।

अंततः हमारी धरोहर केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा भी है। यह हमें बताती है कि विकास केवल ऊँची इमारतें खड़ी करने से नहीं होता, बल्कि ऐसे समाज के निर्माण से होता है जो अपनी संस्कृति, अपने मूल्यों और अपनी पहचान को सहेजकर आगे बढ़े।

जब हम अपनी परम्पराओं को समझेंगे, उनका सार ग्रहण करेंगे और उन्हें अगली पीढ़ी तक पहुँचाएँगे, तभी हमारी सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित रह पाएगी।

क्योंकि धरोहर केवल विरासत में मिली चीज़ नहीं होती, बल्कि वह जिम्मेदारी भी होती है जिसे हमें आने वाली पीढ़ियों तक सम्मानपूर्वक पहुँचाना होता है।

- डॉ. रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर

करनाल

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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