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सुरेश पटवा के व्यंग्य तीर : लोकतंत्र का अपहरण


 

सुरेश पटवा के व्यंग्य तीर :

             लोकतंत्र का अपहरण

     होशोहवास में तो कुछ दिखता नहीं है। मैंने सपने में देखा कि देश के लोकतंत्र का अपहरण हो गया है। अपहरणकर्ता फिरौती में राजा की कुर्सी माँग रहा हैं। पूछने पर वह कभी अपना नाम बावफ़ा और सामने वाली पार्टी को बेवफ़ा बताता है। फिर ओंठों पर कुटिल मुस्कान सजा कहता—“नाम में क्या रखा है? सरगना कोई भी हो, धंधा नहीं बदलता, वो तो वही रहता है।”

मेरे सपने में शोले बरसने लगे। मैं कार्टिनिस्ट लक्ष्मण के कॉमन मेन की तरह भौंचक था। सपना आगे बढ़ा तो पूरा देश रामगढ़ दिखाई दिया। फर्क सिर्फ इतना है कि अब गब्बर कोई व्यक्ति नहीं, एक पद हो गया है। चुनाव जीतते ही गिरोह का समर्थन प्राप्त कोई न कोई व्यक्ति सरगना पद पर बैठ जाता था। उसके अधीन सांभा चुनाव आयोग, कालिया नौकरशाह और संसद डाकुओं का अड्डा कहलाता है। धन्नो घोड़ी तेल टैंकर पर सवार होकर अरब देश से आई है और बसंती इंपोर्टेड है।

रामगढ़ में सत्य, अहिंसा, लोककल्याण और सेवा चुनावी मौसम के गालबजाऊ धर्म हैं। चुनाव समाप्त होते ही इश्कबाज़ी, प्रचार, लूट और सत्ता-सुख शासन के मार्गदर्शक सिद्धांत बन जाते। नेता जनता को सपनों से ठगते और जनता नेताओं को बेशर्म उम्मीदों से ब्लैकमेल करती दिखती है। दोनों एक-दूसरे से शिकायत भी करते और एक-दूसरे पर निर्भर रहते जान भी छिड़कते हैं। 

गब्बर ने रामगढ़ में एक मंदिर बनाया तो वहां भी चढ़ोतरी में सेंध लगा चोरी हो गई। सरदार बहुत नाराज हुआ “साला, हम डाकुओं का माल कौन चांडाल खा गया।” सरदार का बयान आया है कि हालांकि चढ़ोतरी और फिरौती में कोई ख़ास फर्क नहीं है। चढ़ोतरी भी फिरौती की तरह ही कामना सिद्ध अनुष्ठान है। पता करो रामगढ़ के किस नागरिक ने हमारी तरह चोरी की है। दिक्कत चोरी से नहीं, हमारे धंधे में सेंध से है। रामगढ़ वालों ने लिखित संयुक्त बयान जारी किया है कि “हम रामगढ़ वाले चोरी जैसी छोटे काम में समय ख़राब नहीं करते। यह काम तो श्यामगढ़ वालों का है। उनका श्याम माखन चुराते कई बार रंगेहाथ पकड़ाया था। वह अपहरण और राहजनी भी करता था। उसने कौरवों के हाथ से सिंहासन लूटकर पांडवों को दिया था। ख़ुद पुजने लगा। श्याम बहुत चालू है। ”

देश को आज़ाद हुए अस्सी वर्ष होने को हैं। इन वर्षों में घोर अवसरवाद ने आदर्शवाद का स्थान ले लिया है। त्याग और सेवा की नीति मीडिया प्रबंधन की राजनीति बन चुकी है। संघर्ष की जगह ब्रांडिंग ने ले ली है। सत्ता बदलती है, पर सत्ता का स्वभाव नहीं बदलता है। 

रामगढ़ में दो बड़े गिरोह हैं। बाहर से वे एक-दूसरे के कट्टर शत्रु दिखाई देते, भीतर से दोनों सरकारी खजाने को लूटने की जुगत में रहते हैं। चुनाव उनके लिए युद्ध और जनता रणभूमि है। हर पाँच साल में नए वादे किए जाते, पुराने भुला दिए जाते। गब्बर अभी “मिशन–2047” की माला जप रहे हैं, वे विरोधियों को लूट  में बड़ी हिस्सेदारी का प्रलोभन भी देते हैं। जिससे विरोधियों के डाकू टूटकर उनके गिरोह में आते जा रहे हैं। 

गब्बर का सबसे बड़ा कमाल यह है कि उसने नियोजित लूट को अर्थव्यवस्था और अर्थव्यवस्था नियोजन को राष्ट्रहित घोषित कर दिया है। चंदा का नाम फिरौती-शुल्क है। जिसे वसूलना कट्टर नीति बन गया है। सीधे से नहीं देते तो “एक्सिक्यूशन एजेंसीज” के शिकारी कुत्ते पीछे लगा दिए जाते है।  प्रचार राष्ट्रवाद बन गया और चुनाव लोकतंत्र का महापर्व। ठाकुर, जय और वीरू के आदमकद पुतले ऊँची पहाड़ी पर स्थापित करवा दिए हैं। 

जब जनता चीखती कि उसे भी हिस्सा चाहिए, तब नई योजनाएँ आतीं। मुफ्त राशन, मुफ्त बिजली, सम्मान निधि, सहायता अनुदान—सब कुछ एक साथ चलता रहता। जनता को लगता कि उसे कुछ मिला है और गब्बर को संतोष रहता कि बहुत कुछ बचा हुआ है।

नौकरशाही और पुलिस व्यवस्था के दो हाथ थे। कानून के नाम पर व्यवस्था को निचोड़ते और व्यवस्था के नाम पर कानून समझाते। ट्राफिक पुलिस जुर्म होने देती है, फिर क़ानून सम्मत जुर्माना बिना रसीद के वसूलती है। मेट्रो के नाम पर सड़कें खुदी लगी हैं। न्याय की गति इतनी धीमी है कि अपराध बूढ़ा हो जाता, फैसला जवान नहीं हो पाता।

समाचार माध्यमों ने भी अपना धर्म बदल लिया था। वे कभी प्रहरी कहलाते थे, अब प्रायोजक दिखाई देते हैं। बहसों में इतना शोर होता है कि सच की आवाज़ सुनाई ही नहीं देती है। 

उधर संसद में आरोपों के तीर चलते, इधर गलियारों में समझौते होते। जनता को संघर्ष दिखता, खिलाड़ियों को खेल।

एक दिन रामगढ़ की जनता ने पूछा — “हमारे लोकतंत्र का अपहरण किसने किया है?”

गब्बर हँसा। सब्बर हँसा। सांभा हँसा। कालिया हँसा। पीलिया हँसा।

फिर सबने एक साथ कहा—“हमने नहीं, गाँव वालों की उम्मीदों ने किया है।”

जनता चुप हो गई।

मैंने सपने के अंत में लोकतंत्र को एक अँधेरे कमरे में बँधा देखा। वह घायल, मृतप्रायः दिख रहा है मगर उसके चेहरे पर अजीब-सी मुस्कान है। दो बूँद शुद्ध गंगाजल माँग रहा है, मगर शुद्ध का प्रश्न पचास करोड़ डुबो कर भी मुँह बाए खड़ा है। 

मैंने पूछा—“तुम्हें बचाने कौन आएगा?”

लोकतंत्र बोला — “जब जनता मूक दर्शक बनना छोड़ देगी, तब शायद मैं स्वयं लौट आऊँगा।”

इतना कहकर वह गायब हो गया और मेरी नींद खुल गई। मैं मतदाता हूँ तो क्या ? इतनी गर्मी में धूप सेंकने निकलूँ, नहीं भाई, चोरी की मुफ़्त बिजली से करंट मिलता एसी चलाया और फिर से सो गया। 

@सुरेश पटवा , भोपाल

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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