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चैन की तलाश में चयन और चुनाव की भूमिका - डाॅ.राकेश सक्सेना , एटा


 

चैन की तलाश में चयन और चुनाव की भूमिका

       -  डाॅ.राकेश सक्सेना , एटा

    मानव-जीवन निर्णय लेने की अनवरत यात्रा का नाम है। जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य अनगिनत विकल्पों, चयन और चुनावों का सामना करता है। वह क्या पढ़े? किन लोगों से सम्बन्ध बनाए? किसका समर्थन करे? ये सभी प्रश्न उसके जीवन की दशा और दिशा तय करते हैं। चयन व चुनाव की इस पृष्ठभूमि में चैन या मानसिक शांति प्राप्त करना ही मनुष्य का मूलभूत उद्देश्य होता है। चैन एक मानसिक व आध्यात्मिक अवस्था है जिसमें व्यक्ति स्वयं के साथ संतुलन स्थापित कर लेता है। चयन और चुनाव दोनों शब्द समान प्रतीत होते हैं किन्तु दोनों में सूक्ष्म अंतर है। चयन का अर्थ उपलब्ध विकल्पों में से किसी एक को चुनना है। यह प्रक्रिया व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक या सांस्कृतिक हो सकती है, उदाहरणार्थ-- शिक्षा ( विज्ञान, वाणिज्य, कला, तकनीकी ), कैरियर ( व्यवसाय, नौकरी ), मित्रों, जीवन साथी अथवा जीवन- मूल्यों ( सत्य, अहिंसा, ईमानदारी, करुणा, सेवा आदि ) का चयन और चुनाव का अर्थ व्यापक है। यह व्यक्तिगत निर्णय नहीं बल्कि सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का भी प्रतीक है, यथा- लोकतांत्रिक चुनाव, संगठनात्मक चुनाव, सामाजिक नेतृत्व का चुनाव। इस प्रकार चयन व्यक्तिगत जीवन को और चुनाव सामाजिक जीवन व सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित करता है। 

      चैन, चयन व चुनाव तीनों ही एक- दूसरे से आबद्ध होते हैं। चैन यदि मन की संतुष्टि और जीवन में सामंजस्य की अवस्था है तो चयन और चुनाव मनुष्य के रहन-सहन एवं जीवन की दिशा निर्धारित करने की प्रक्रियाएँ हैं। सही चयन और विवेकपूर्ण चुनाव संतोष, सफलता, विकास और शांति ला सकते हैं जबकि गलत निर्णय तनाव, असंतोष, लड़ाई-झगड़े, प्रतिस्पर्धा एवं संघर्ष का कारण बन सकते हैं। भारतीय दर्शन में चयन और चैन को अत्यधिक महत्व दिया गया है। उपनिषदों में श्रेय और प्रेय का उल्लेख मिलता है। प्रेय तात्कालिक सुख देने वाला मार्ग होता है और श्रेय दीर्घकालिक कल्याण करने वाला। मनुष्य को श्रेय का चयन करने की सलाह दी गई है। अत: चैन प्राप्त करने के लिए चयन और चुनाव में भावनाओं के स्थान पर तर्क और अनुभव का उपयोग, सही और गलत के बीच अंतर करने की क्षमता, क्षणिक लाभ के बजाय स्थायी कल्याण को महत्व देना ही उचित होता है। ध्यान रखने की बात यह है कि व्यक्तिगत चयन का प्रभाव परिवार पर, सामाजिक चुनाव का प्रभाव समुदाय पर तथा राजनीतिक चुनाव का प्रभाव राष्ट्र पर पड़ता है, इसलिए व्यक्ति द्वारा चयन और चुनाव का निर्णय केवल अधिकार नहीं अपितु उत्तरदायित्व भी समझा जाना चाहिए।

      चयन और चैन का मनोवैज्ञानिक सम्बन्ध भी होता है। व्यक्ति की संतुष्टि उसके निर्णयों से जुड़ी होती है। निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलती है तो मनुष्य अधिक संतुष्ट महसूस करता है। सही चयन उसके आत्मविश्वास को बढ़ाता है और अत्यधिक विकल्प निर्णय लेने को कठिन बनाते हैं, असंतोष को जन्म देते हैं, पछतावे की भावना उत्पन्न करते हैं। आज जिसको भी देखिए वह तीरंदाज है लेकिन मानसिक तनाव, अवसाद और असंतोष की समस्याओं से जूझ रहा है, एक-दूसरे को धकेलकर आगे बढ़ने की होड़ लगी हुई है, शिक्षा,अनुभव, विद्वता व विकास की भावना को दरकिनार किया जा रहा है। ऐसे समय में चैन, चयन और चुनाव का प्रश्न अत्यधिक महत्वपूर्ण हो गया है। यदि व्यक्ति संतोष की भावना विकसित करके नैतिक व विवेकपूर्ण चयन- चुनाव करे तो व्यक्तिगत तथा सामाजिक दोनों स्तरों पर शांति और समृद्धि स्थापित की जा सकती है।

      सारत: हम कह सकते हैं कि चैन,चयन और चुनाव मानव- जीवन की परस्पर जुड़ी अवधारणाएँ हैं। मनुष्य जीवन पर्यन्त चैन की तलाश में रहता है किन्तु भूल जाता है कि इस तलाश का रास्ता उसके चयन और चुनावों से होकर गुजरता है। सही चयन ही जीवन को दिशा देता है, विवेकपूर्ण जनहितकारी नेतृत्व का चुनाव समाज में विकास और चैन का वातावरण निर्मित करता है। वास्तविक चैन विकल्पों की बहुलता में नहीं, सही चयन और सार्थक चुनाव के निर्णय में ही निहित है, अत: भ्रमित और तनावग्रस्त होने के बजाय बेहतर भविष्य व चैन की प्राप्ति के लिए विवेकपूर्ण चयन और चुनाव ही आपके उत्तरदायित्व को प्रमाणित करेगा।

                      

डाॅ.राकेश सक्सेना, 

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 

68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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