काव्य :
निःशब्द
निःशब्द कर देती है
रब्बा
तेरी ये कारगुजारियाँ
माटी के पुतलों में
तूने
भर दीं कितनी शैतानियाँ
रात-दिन दिल-दिमाग
में
क्रियाशील उसके रहती
कारगुजारियाँ।
भावनाओं का दम घुट
रहा
स्वार्थी क्रुरता का अट्टहास चारोंओर
गूँज रहा
नैतिकता, मर्यादा दूर
खड़ी
देख तमाशा बिसुर
रही
माटी का पुतला माटी में
रुल रहा।
संस्कार तो सारे अंध-
कूप में गिरे
संस्कृति ने पाश्चात्य का
मुखौटा लगा लिया
नशा तारी है नौजवानों की रग में
अल्हड़ जवानी रील में
गुम होने लगी
बेवजह करने लगा
नादानियाँ।
- डा.नीलम , अजमेर
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