मनुष्यों के भीतर का मनुष्य क्यों मरता जा रहा है
- देवेन्द्र कुमार रावत , भोपाल
वर्तमान में विज्ञान के साधनों से प्राप्त चिकित्सा सुविधाओं के होते हुए जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि होती जा रही है । अनुमानित आंकड़ों के अनुसार, इस समय पृथ्वी पर 8.32 अरब से अधिक जनसंख्या का भार है । इतनी बड़ी आबादी में आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि हममें से अब भीतर से कितने आदमी बचे हैं, इसकी गणना कर पाना भले ही संभव न हो, लेकिन हमारे भीतर के आदमियों की संख्या दिनों-दिन कम होती जा रही है । इसके प्रमाण में हम वर्तमान विश्व की स्थिति को देखकर कह सकते हैं कि बढ़ते आतंक, हिंसा और कई तरीकों से शोषण का अनुसंधान करने वाले आदमियों की संख्या अब बहुत बढ़ गई है । यदि यही स्थिति रही तो यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि एक दिन ऐसा आएगा, जब इस दुनिया में "लंका निसिचर निकर निवासा, यहाँ कहाँ सज्जन कर वासा" की स्थिति आ सकती है । इस संदर्भ में यहाँ यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि हम सबके भीतर के आदमी को मारने में किसी बाहरी ग्रह के लोगों का हाथ नहीं है, बल्कि इसमें तो हम सब लोग ही जिम्मेदार हैं । हमने अब बाहर से आदमी की खाल भर ओढ़ ली है, इसलिए भीतर का भेड़िया पकड़ में नहीं आ पा रहा है; क्योंकि हमने अपनी भूख मिटाने के लिए सारी मर्यादाओं को तार-तार कर दिया है । हम सब अब वो सपेरे होते जा रहे हैं, जिनकी कर्म की पिटारी में अश्लीलता का अनंग (नाग) पेट भरने का साधन बनता जा रहा है, जिसे हम मनोरंजन के नाम पर सबके सामने चैन की बीन बजाते हुए नचाते हैं । हम अपनी अज्ञानता से यह नहीं जानते कि हर आदमी के भीतर भी एक अनंग "बिना देह वाला नाग" रहता है, जिसे हमारे ऋषि-मुनियों ने संयम, साधना, तप और त्याग की जीवनशैली से नाथकर नियंत्रित किया था । तथा इसे संस्कारों के माध्यम से नियंत्रित करने की बात वे कहते रहे हैं । उन्होंने यह भी बताया है कि यदि इसे असंयमित रूप से खुला छोड़ दिया जाए, तो इसके दंश से बच पाना संभव नहीं होता है । इसका जहर जब आँखों में आता है, तब दृष्टि-कुदृष्टि में बदल जाती है । ऐसे लोग "नहीं मानत कोउ अनुज तनुजा" अर्थात बहन-बेटियों पर भी कुदृष्टि रखने लगते हैं । इसी कारण आज हमारे घरों में भी बेटियाँ सुरक्षित नहीं रही हैं। समझ में नहीं आ रहा है कि भौतिक सभ्यता के शिखर पर पहुँचा हमारा समाज इन दुष्कृत्यों को कैसे रोके ? अब तो ऐसी घटनाएँ समाज को सबक देती हों, ऐसा भी नहीं लगता है ? हम सब द्वापर युग की तरह अब एक नहीं, कई दुर्योधनों के द्वारा द्रौपदियों के चीर-हरण के साक्षी बन रहे हैं । हमारी न्यायपालिका ऐसे दुष्कर्मियों को दंडित भी कर रही है, पर आए दिन अखबारों में छपे समाचारों से ऐसा नहीं लगता कि हमने इन दुष्कर्मों पर नियंत्रण पा लिया है । तब विचारणीय है कि हम कैसे असंयमित काम पर संयम की लगाम लगाएँ ? इस संदर्भ में हमें एकमात्र आशा हमारे धर्म क्षेत्र से थी, जहाँ हमारी पौराणिक कथाओं में दृष्टांतों के माध्यम से काम के असंयम से उत्पन्न दुष्परिणामों से बचने की बात बार-बार कही गई है; लेकिन वे वहाँ भी मीरा, कबीर और तुलसी के भजनों की आड़ में "तेरा तन डोले मेरा मन डोले" की धुन पर श्रोताओं को नाचने के लिए मजबूर कर रहे हैं । इनके ही प्रभाव में आकर हमारी ऋषि-परंपरा को भी मिटाने की पूरी कोशिश की जा रही है । इस संदर्भ में देखा तो यह भी जा रहा है कि जहाँ यह ऑर्केस्ट्रा टीम मंच पर नहीं दिखाई देती है, वहाँ रसिक श्रोताओं की उपस्थिति नगण्य रहती है । दूसरे, धार्मिक कथा के विभिन्न प्रसंगों पर आधारित आए पात्रों को जब श्रृंगार करके नचाया जाता है, तब बेचारे वे कलाकार, जिन्हें आत्मा-परमात्मा के आध्यात्मिक ज्ञान का अभाव है, वे अपना नृत्य करते समय चेहरों पर जब फिल्मी हाव-भाव लाते हैं, तो इसे देखकर सदा भ्रमण करने वाले देवर्षि नारद को भी हँसी अवश्य आती होगी ? इन्हें कौन समझाए कि इससे संस्कृति में कितनी विकृतियाँ आ रही हैं ! अब तो यह भी देखा जा रहा है कि वे वस्तुएँ, जिनका सुंदरता से कहीं कोई संबंध नहीं है, उनकी पैकिंग पर देह-दर्शन का सुख आँखों को मिलने लगा है । दूसरे, समाज में चाहे स्त्री हो या पुरुष, सभी प्रकार की समृद्धि के होते हुए भी कम से कम कपड़ों में अपना काम चलाने लगे हैं । "अब सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी" का भ्रम भी नहीं रहा है । इस पंक्ति को लिखने वाले बेचारे कवि आज होते, तो अपने काव्य-कौशल की यह हालत देखकर माथा ही ठोक लेते और व्याकरण शास्त्र में 'संदेह अलंकार' की शव-यात्रा भी निकल जाती । कुछ भी कहो, दिनों-दिन अब यह सब भीतर के आदमी के मरने का ही संकेत है ।
महेंद्रा स्कावयर्स
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