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विश्व मगरमच्छ दिवस: संरक्षण चेतना का वैश्विक अभियान - डाॅ.राकेश सक्सेना ,एटा


 

विश्व मगरमच्छ दिवस: संरक्षण चेतना का वैश्विक अभियान

  - डाॅ.राकेश सक्सेना ,एटा

       मगरमच्छ सरीसृप ( ठंडे खून वाले रीढ़धारी जो रेंगकर चलते हैं ) जीव है, जो मुख्य रूप से नदियों, झील व दलदली इलाकों में पाए जाते हैं। इनकी त्वचा बहुत कठोर, जबड़े मजबूत, लम्बी पूँछ तथा मुख में साठ से अस्सी नुकीले दाँत होते हैं। ये पानी के भीतर बिना साँस लिए काफी देर तक रह सकते हैं। जब ये किसी बड़े जानवर का शिकार करते हैं तो उसे पानी में खींचकर अपना शरीर तेजी से घुमाते हैं जिसे डेथरोल कहा जाता है, इससे शिकार के टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं। इनके देखने,सुनने व सूँघने की क्षमता इन्हें एक कुशल शिकारी बनाती है। घड़ियाल, ऐलिगेटर, कैमन आदि इनकी प्रजातियाँ करोड़ों वर्षों से इस पृथ्वी पर मौजूद हैं। मगरमच्छ की माँ अपने अंडों के पास रहकर उन्हें शिकारियों से बचाती है। जब अंडे फूटने के लिए तैयार होते हैं तो बच्चे टर्राते हैं और इंतज़ार कर रही माँ इनको पानी में ले जाती है। वह उन्हें अपने नुकीले दाँतों से बचाती है। प्रजाति के आधार पर मादा मगरमच्छ एक बार में उन्नीस बच्चे तक अपने मुँह में ले जा सकती है। माँ और बच्चे एक-दूसरे से बात करते हैं। बच्चे ऐसी आवाज़ निकालते हैं जिससे माँ दौड़कर उनके पास आ जाती है और माँ भी एक खास आवाज़ निकालती है तो बच्चे उसके पास आ जाते हैं।

        शीर्ष शिकारी की भूमिका में मगरमच्छ मछलियों तथा अन्य जलीय जीवों की संख्या को नियंत्रित करते हैं जिससे पारिस्थितिक संतुलन बना रहता है। इनकी उपस्थिति किसी जलाशय के स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत माना जाता है। मृत एवं बीमार जीवों को खाकर मगरमच्छ जलस्रोतों को प्रदूषित होने से बचाते हैं। जहाँ पर ये सुरक्षित रहते हैं, उस स्थान की सम्पूर्ण आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण सम्भव होता है,अत: इनके महत्व को दृष्टिगत रखते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हर वर्ष 17 जून को ' विश्व मगरमच्छ दिवस ' मनाया जाता है। यह दिवस पहली बार 2017 ई० में मनाया गया, जिसकी शुरुआत मगरमच्छ अनुसंधान गठबंधन, बेलीज चिड़ियाघर और उष्ण कटिबंधीय शिक्षा केन्द्र द्वारा की गई थी। भारत में 1975 ई० में मगरमच्छ संरक्षण परियोजना शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य मगरमच्छ को प्राकृतिक आवास की रक्षा करना और बंदी प्रजनन के माध्यम से इनकी आबादी को तेजी से पुनर्जीवित करना था क्योंकि शिकार के कारण प्रकृति में मगरमच्छ के बच्चों की जीवित रहने की दर कम  थी। इस परियोजना ने भारत में मगरमच्छों की आबादी में वृद्धि की है, भितरकनिका में खारे पानी को मगरमच्छों का संरक्षण किया जा रहा है, प्रजनन केन्द्रों की स्थापना हुई है।

     मगरमच्छों के संरक्षण हेतु जहाँ विभिन्न उपाय किए जा रहे हैं वहाँ इनके समक्ष अनेक चुनौतियाँ भी हैं। नदियों पर बाँध निर्माण, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण आदि कारणों से मगरमच्छों के आवास तेजी से नष्ट हो रहे हैं। औद्योगिक कचरा, प्लास्टिक, रासायनिक प्रदूषण इनके जीवन को नष्ट कर रहे हैं, इनकी चमड़ी और माँस के लिए बड़े पैमाने पर शिकार हो रहा है, बढ़ता तापमान इनके प्रजनन को प्रभावित कर रहा है। मानव आबादी के विस्तार के कारण मगरमच्छ और मनुष्य के बीच संघर्ष तेजी से बढ़ रहा है, इसके लिए दोनों के बीच सह अस्तित्व की आवश्यकता है। जनजागरूकता अभियान, नदी किनारे सुरक्षा संकेत, वैकल्पिक जल स्रोतों की व्यवस्था, वैज्ञानिक निगरानी, त्वरित राहत एवं मुआवज़ा प्रणाली जैसे उपाय किए जाने चाहिए। विद्यालयों, महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में निबंध, चित्रकला प्रतियोगिताओं के साथ वन्यजीव प्रदर्शनी व संगोष्ठियाँ आयोजित कर युवापीढ़ी को संरक्षण के प्रति प्रेरित किया जा सकता है।

       सारत: विश्व मगरमच्छ दिवस वन्यजीव व प्रकृति संरक्षण के प्रति वैश्विक प्रतिबद्धता का प्रतीक है। मगरमच्छ का अस्तित्व नदियों, झीलों, आर्द्रभूमियों और जैव विविधता के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। आज जब जलवायु परिवर्तन, मानव क्रियाकलापों, प्रदूषण के कारण प्राकृतिक संसाधनों पर तेजी से दबाव बढ़ रहा है तब इन जीवों का संरक्षण एक नैतिक और पर्यावरणीय दायित्व बन जाता है।

 -  डाॅ. राकेश सक्सेना, 

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, 

एटा ( उ०प्र० ) 207001

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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