ad

बरगद की छांव और अनकही मोहब्बत : आधुनिक पैरेंटिंग में पिता का बदलता स्वरूप -डॉ रीटा अरोड़ा ,करनाल


 

आलेख :

बरगद की छांव और अनकही मोहब्बत : आधुनिक पैरेंटिंग में पिता का बदलता स्वरूप


 “पापा, आप कभी थकते नहीं?”

बेटे ने उनके कंधे पर सिर रखते हुए पूछा।

पिता मुस्कुराए -

“थकता हूँ बेटा, पर तुम्हारी मुस्कान देखता हूँ तो थकान थोड़ी पीछे रह जाती है।”

बेटे ने धीरे से उनका हाथ पकड़ लिया।

शायद कुछ रिश्ते शब्दों से नहीं, स्पर्श से समझे जाते हैं।

एक समय था जब पिता का अर्थ घर की व्यवस्था, अनुशासन और जिम्मेदारियों से जोड़ा जाता था। बच्चे पिता को सम्मान तो बहुत देते थे, लेकिन उनके सामने सहज होने का साहस कम ही जुटा पाते थे। पिता परिवार का मजबूत स्तंभ थे, लेकिन भावनाओं की अभिव्यक्ति अक्सर उनके व्यक्तित्व का हिस्सा नहीं मानी जाती थी।

आज तस्वीर बदल रही है।

आधुनिक परिवारों में पिता की भूमिका केवल कमाने वाले सदस्य या अनुशासन स्थापित करने वाले अभिभावक तक सीमित नहीं रही। वे अब बच्चों के पालन-पोषण, भावनात्मक विकास और दैनिक जीवन का सक्रिय हिस्सा बनते जा रहे हैं। बदलते समय के साथ पितृत्व का स्वरूप भी बदल रहा है।

फिर भी एक बात आज भी नहीं बदली है-पिता का प्रेम।

बस उसका तरीका बदल गया है।

यदि माँ प्रेम की खुली किताब है तो पिता वह अध्याय हैं जिसे अक्सर ध्यान से पढ़ने पर ही समझा जा सकता है। 

माँ की ममता दिखाई देती है, पिता की मोहब्बत महसूस होती है। 

माँ आँचल से आँसू पोंछती है, पिता चुपचाप संघर्षों को अपने भीतर समेट लेते हैं।

शायद इसी कारण पिता की तुलना अक्सर बरगद से की जाती है।

बरगद स्वयं धूप सहता है, लेकिन दूसरों को छाया देता है। उसकी जड़ें जितनी गहरी होती हैं, उसकी छांव उतनी ही व्यापक होती है। पिता भी परिवार के जीवन में कुछ ऐसा ही स्थान रखते हैं।

भारतीय समाज में पिता को लंबे समय तक परिवार के संरक्षक और निर्णयकर्ता के रूप में देखा गया। उनकी भूमिका मुख्यतः आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने तक सीमित समझी जाती थी। बच्चों की पढ़ाई, करियर, स्वास्थ्य और भविष्य की चिंता तो वे करते थे, लेकिन उनके साथ बैठकर भावनाएँ साझा करना अपेक्षाकृत कम दिखाई देता था।

लेकिन पिछले दो दशकों में यह परिदृश्य तेजी से बदला है।

आज का पिता अपने बच्चे का पहला दोस्त बनने की कोशिश कर रहा है। वह स्कूल की अभिभावक बैठकों में शामिल होता है, बच्चों के साथ खेलता है, उनकी समस्याएँ सुनता है और उनके मानसिक स्वास्थ्य को भी उतना ही महत्व देता है जितना उनकी पढ़ाई को।

यह परिवर्तन केवल सामाजिक बदलाव नहीं है, बल्कि पैरेंटिंग की सोच में आए गहरे बदलाव का संकेत है।

अब यह समझ विकसित हो रही है कि बच्चे केवल आर्थिक सुरक्षा से नहीं, भावनात्मक सुरक्षा से भी विकसित होते हैं।

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि जिन बच्चों को अपने पिता के साथ खुलकर संवाद करने का अवसर मिलता है, उनमें आत्मविश्वास अधिक होता है। वे अपने विचारों को बेहतर ढंग से व्यक्त कर पाते हैं और जीवन की चुनौतियों का सामना अधिक संतुलन के साथ करते हैं।

विशेष रूप से बेटियों के जीवन में पिता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। एक संवेदनशील और सहयोगी पिता बेटी के भीतर आत्मसम्मान और सुरक्षा की मजबूत भावना विकसित करता है। वहीं बेटों के लिए पिता केवल अभिभावक नहीं, बल्कि व्यवहार और मूल्यों के जीवंत उदाहरण होते हैं।

बच्चे अक्सर वह नहीं सीखते जो उन्हें बताया जाता है। वे वह सीखते हैं जो वे अपने माता-पिता को करते हुए देखते हैं।

इसलिए आधुनिक पिता केवल उपदेश नहीं दे रहे, बल्कि उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं।

हालाँकि इस परिवर्तन के साथ नई चुनौतियाँ भी सामने आई हैं।

आज का जीवन अत्यधिक व्यस्त हो चुका है। लंबी कार्य अवधि, पेशेवर दबाव, डिजिटल दुनिया की व्यस्तताएँ और प्रतिस्पर्धी जीवनशैली ने परिवार के लिए समय निकालना कठिन बना दिया है।

कई पिता अपने बच्चों को बेहतर भविष्य देने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं। लेकिन इसी प्रयास में कभी-कभी वे उनके साथ बिताने योग्य वर्तमान को खो बैठते हैं।

बच्चों को सबसे अधिक जिस चीज़ की आवश्यकता होती है, वह महंगे खिलौने या नवीनतम गैजेट नहीं होते।

उन्हें चाहिए समय।

उन्हें चाहिए यह एहसास कि उनके पिता उनकी बातें सुनने के लिए उपलब्ध हैं।

डिजिटल युग ने इस चुनौती को और बढ़ा दिया है। आज परिवार एक ही घर में रहते हुए भी अलग-अलग स्क्रीन में व्यस्त दिखाई देता है। संवाद की जगह संदेशों ने ले ली है और साथ बैठने की जगह ऑनलाइन उपस्थिति ने।

ऐसे समय में पिता की भूमिका केवल परिवार का प्रबंधन करने की नहीं, बल्कि संवाद की संस्कृति को जीवित रखने की भी है।

एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन यह है कि आज पिता अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में पहले की तुलना में अधिक सहज हो रहे हैं।

कभी यह माना जाता था कि पुरुष रोते नहीं हैं। पिता को हमेशा मजबूत और अडिग दिखाई देना चाहिए। लेकिन अब धीरे-धीरे यह समझ विकसित हो रही है कि संवेदनशीलता कमजोरी नहीं, बल्कि मानवीय शक्ति है।

जब बच्चे अपने पिता को भावनाओं को सम्मानपूर्वक व्यक्त करते हुए देखते हैं, तो वे भी अपनी भावनाओं को दबाने के बजाय समझना सीखते हैं।

शायद यही आधुनिक पितृत्व की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

यह कठोरता से करुणा की ओर, दूरी से संवाद की ओर और अधिकार से सहभागिता की ओर बढ़ने की यात्रा है।

फादर्स डे हमें केवल उपहार देने का अवसर नहीं देता। यह हमें उस मौन प्रेम को पहचानने का अवसर देता है, जो अक्सर शब्दों में व्यक्त नहीं होता।

उन अनगिनत त्यागों को याद करने का अवसर देता है, जो किसी सूची में दर्ज नहीं होते।

और उस बरगद की छांव को महसूस करने का अवसर देता है, जिसके नीचे खड़े होकर हम जीवन की आँधियों से सुरक्षित रहते हैं।

क्योंकि पिता की मोहब्बत अक्सर कही नहीं जाती।

वह बच्चों की सफलताओं में मुस्कान बनकर दिखाई देती है, उनकी असफलताओं में हौसला बनकर खड़ी रहती है और जीवन की हर कठिन राह पर एक अदृश्य सहारे की तरह साथ चलती है।

शायद इसलिए पिता को समझने के लिए उनके शब्द नहीं, उनका जीवन पढ़ना पड़ता है।

और तब महसूस होता है कि बरगद की सबसे बड़ी खूबसूरती उसकी ऊँचाई में नहीं, उसकी छांव में होती है।

- डॉ रीटा अरोड़ा 

सेवानिवृत्ति एसोसिएट प्रोफेसर 

करनाल

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

Post a Comment

Previous Post Next Post