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सिंधियत की गूंज : जब इटारसी में एक सिनेमाघर 'सांस्कृतिक पुनर्जागरण' का साक्षी बना



सिंधियत की गूंज : जब इटारसी में एक सिनेमाघर 'सांस्कृतिक पुनर्जागरण' का साक्षी बना

 इटारसी। जड़ें जितनी गहरी होती हैं, संस्कृति का वृक्ष उतना ही अमर होता है। भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि किसी भी समाज की आत्मा की धड़कन होती है।
रविवार, 19 जुलाई 2026 का दिन इटारसी के इतिहास में सिंधी समाज के लिए केवल मनोरंजन का एक दिन नहीं था, बल्कि यह अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटने और उस पर गर्व करने का एक ऐतिहासिक उत्सव था। सिनेमा स्टूडियो पार्क आज एक थियेटर मात्र नहीं रहा, बल्कि वह एक ऐसा संगम बन गया जहां सिंधी समाज की तीन पीढिय़ां—वरिष्ठजन, महिलाएं, युवा और नन्हे बच्चे—एक साथ अपनी मातृभाषा के सत्कार में खड़े थे। अवसर था सुपरहिट सिंधी फिल्म 'हा मां भी सिंधी अहिंयां' (हां, मैं भी सिंधी हूं) के विशेष प्रदर्शन का।
 क्या है इस फिल्म का मर्म?
भगवान मुक्ता चंदानी द्वारा निर्मित और आरके गिडवानी द्वारा निर्देशित यह फिल्म केवल पर्दे पर चलती कुछ दृश्यों की कहानी नहीं है, बल्कि यह हर उस सिंधी परिवार के अंतर्मन की आवाज है जो आधुनिकता के दौर में अपनी भाषा और जड़ों को पीछे छोड़ रहा है। फिल्म का मूल मर्म 'मातृभाषा की अहमियत और सांस्कृतिक संरक्षण' है। यह एक भावनात्मक पारिवारिक ताना-बाना है जो दर्शक को अंदर तक झकझोरता है और यह सोचने पर मजबूर करता है कि यदि भाषा लुप्त हो गई, तो पहचान भी धुंधली हो जाएगी। फिल्म यह संदेश पुरजोर तरीके से देती है कि आधुनिक दुनिया में कितनी भी तरक्की कर ली जाए, पर अपनी पहचान पर गर्व से कहना कि—'हा मां भी सिंधी अहिंयां'—ही वास्तविक समृद्धि है।
 एकजुटता का वो अद्भुत सैलाब
पूज्य पंचायत सिंधी समाज के इस बेहतरीन और अनुकरणीय प्रयास का असर यह हुआ कि सिनेमाघर में समाज के ढाई सौ से अधिक सदस्यों की मौजूदगी से शो पूरी तरह हाउसफुल रहा।
 समाज के उपाध्यक्ष अनिल मिहानी ने बताया कि उत्साह का आलम यह था कि निर्धारित सीटों के बाद भी लोग आते रहे। कई लोगों के लिए अतिरिक्त कुर्सियों की व्यवस्था की गई, और जब तिल धरने की भी जगह नहीं बची, तब बेहद सम्मानजनक तरीके से कुछ लोगों को रोकना पड़ा। यह दृश्य दर्शाता है कि समाज अपनी संस्कृति के लिए कितना लालायित है।
 अपनत्व का स्वाद : पूज्य पंचायत की ओर से सामूहिक रूप से आए सभी सदस्यों के लिए स्वल्पाहार और मिल्क शेक की व्यवस्था की गई थी, जिसने इस सिनेमाई अनुभव को एक पारिवारिक पिकनिक और उत्सव में बदल दिया।
 वरिष्ठों और प्रबुद्ध जनों की दृष्टि में
 यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि समाज को एकजुट करने, जगाने और सिंधी भाषा को नया जीवन देने वाली एक संजीवनी है।
 कैलाश नवलानी, अध्यक्ष पूज्य पंचायत सिंधी समाज
समाज के प्रबुद्ध जन—मोहन चेलानी, विजय मनवानी, सोनू परियानी आदि ने इस आयोजन को एक ऐतिहासिक और मील का पत्थर प्रयास बताया। वक्त के थपेड़ों के बीच जब संस्कृतियां अपनी पहचान बचाने का संघर्ष कर रही हैं, तब इटारसी के सिंधी समाज ने आज यह साबित कर दिया कि वे अपनी विरासत को खोने नहीं देंगे। जब एक पूरा समाज अपनी भाषा के सिनेमा को देखने के लिए इस कदर उमड़ पड़ता है, तो वह केवल एक फिल्म नहीं देख रहा होता, बल्कि आने वाली पीढ़ी के सुनहरे भविष्य और अपनी संस्कृति की अमरता की पटकथा लिख रहा होता है। आज द पार्क सिनेमा से निकलने वाले हर चेहरे पर एक ही संतोष था—'भाषा बची रहेगी, तो हम बचे रहेंगे।'
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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