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स्टेटस: जो जुबान नहीं कहती, वह स्क्रीन कह देती है - डॉ. रीटा अरोड़ा , करनाल


आलेख :

स्टेटस: जो जुबान नहीं कहती, वह स्क्रीन कह देती है

कुछ दिन पहले एक मित्र का व्हाट्सऐप स्टेटस देखा।
सुबह छह बजे पहाड़ों के बीच सूर्योदय की तस्वीर थी। नीचे लिखा था-"Finally, Peace."
मैंने सोचा, वाह! जीवन कितना सुंदर चल रहा होगा।
शाम को उसी मित्र का फोन आया।
करीब एक घंटे तक वह केवल अपनी परेशानियाँ सुनाता रहा—काम का तनाव, घर की जिम्मेदारियाँ, भविष्य की चिंता और भीतर का अकेलापन।
फोन रखने के बाद अचानक लगा...
हम अब चेहरे नहीं पढ़ते, स्टेटस पढ़ते हैं।
और कई बार दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल अलग होते हैं।

एक समय था जब किसी का हाल जानने के लिए उसके घर जाना पड़ता था। अब मोबाइल खोलते हैं और मान लेते हैं कि सामने वाले की पूरी जिंदगी जान गए। 

अगर किसी ने चाय की तस्वीर डाल दी, तो लगता है जिंदगी का आनंद ले रहा है।
विदेश की तस्वीर आई, तो मान लिया कि बहुत खुश है।
मंदिर की फोटो आई, तो समझ लिया कि बड़ा धार्मिक हो गया।
और अगर अचानक किसी ने लिख दिया-"कर्मों का हिसाब यहीं होगा..."
तो आधी कॉन्टैक्ट लिस्ट सोचने लगती है-"कहीं बात मेरे लिए तो नहीं लिखी?"

सोशल मीडिया का स्टेटस बड़ा दिलचस्प आईना है।

यह जितना दूसरों को दिखाने के लिए लगाया जाता है, उससे कहीं ज्यादा किसी एक व्यक्ति को दिखाने के लिए लगाया जाता है। कई बार पूरा स्टेटस केवल एक व्यक्ति के लिए होता है। बाकी सब तो सिर्फ दर्शक होते हैं। इसीलिए कुछ लोग स्टेटस नहीं पढ़ते... उसे समझने की कोशिश करते हैं।

मैंने एक युवक से पूछा, "इतने स्टेटस क्यों लगाते हो?"
वह मुस्कुराया। बोला, "सर, जो बातें मैं किसी से कह नहीं पाता, वही स्टेटस कह देता है।"
उसकी बात सुनकर लगा कि शायद आज का स्टेटस आधुनिक युग की डायरी बन गया है।
फर्क सिर्फ इतना है कि पहले डायरी ताले में बंद रहती थी। अब पूरी कॉन्टैक्ट लिस्ट उसे पढ़ती है।

मजेदार बात यह है कि सबसे ज्यादा स्टेटस वही लोग देखते हैं, जो कहते हैं- "मुझे किसी से मतलब नहीं।" उंगली लगातार स्क्रीन पर चलती रहती है।

किसने क्या डाला?
किसने कहाँ घूमकर फोटो डाली?
किसने नई गाड़ी खरीदी?
किसने किसके साथ तस्वीर लगाई?

और फिर शुरू होता है तुलना का खेल।
दूसरे का सबसे अच्छा पल... अपने पूरे जीवन से तुलना करने लगते हैं। यहीं गलती हो जाती है।  क्योंकि स्टेटस जीवन नहीं होता।  जीवन का सिर्फ चुना हुआ एक क्षण होता है।
आजकल धार्मिक यात्राएँ भी स्टेटस का हिस्सा बन गई हैं। पहले लोग दर्शन करके मन हल्का करते थे। अब कई लोग पहले कैमरा ऑन करते हैं। यह बात यात्रा की पवित्रता पर सवाल नहीं उठाती।

सवाल सिर्फ इतना है कि क्या हम ईश्वर से मिलने गए थे...  या दर्शकों से? हर व्यक्ति को यह प्रश्न स्वयं से पूछना चाहिए।

लेकिन स्टेटस का दूसरा चेहरा भी है।

कई बार वही स्टेटस किसी की जान बचा देता है।
किसी मरीज के लिए रक्त चाहिए होता है।
किसी गरीब छात्र की फीस जुटानी होती है।
किसी गुमशुदा बच्चे को घर पहुँचाना होता है।
एक छोटा-सा स्टेटस हजारों लोगों तक पहुँच जाता है।

यानी वही माध्यम, जो दिखावे का साधन बन सकता है, सेवा का माध्यम भी बन सकता है।

औजार कभी अच्छे या बुरे नहीं होते।
उन्हें इस्तेमाल करने का तरीका अच्छा या बुरा होता है।

शायद इसलिए असली प्रश्न यह नहीं है कि हम स्टेटस लगाते हैं या नहीं।
प्रश्न यह है कि हमारा वास्तविक स्टेटस क्या है?
जब मोबाइल बंद हो जाता है...
जब इंटरनेट नहीं चलता...
जब कोई दर्शक नहीं होता...

तब हम भीतर से कितने शांत हैं?

कितने सच्चे हैं?
कितने संतुष्ट हैं?

क्योंकि जीवन का सबसे सच्चा स्टेटस वही है, जिसे किसी स्क्रीन पर लगाने की जरूरत नहीं पड़ती।
उसे लोग आपके व्यवहार में पढ़ लेते हैं।
और शायद वही स्टेटस चौबीस घंटे बाद गायब भी नहीं होता।

-  डॉ. रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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