काव्य :
उठ जा आँखें खोल
दिखा रही क्यों नखरे हमको
अब तू कुछ तो बोल
हुआ दवा का टाइम अम्मा
उठ जा आँखें खोल।
टूट रहा आशा का अपना
आज यहाँ संबल है
होता अब दिल के आँगन में
यादों का दंगल है
किसके दर पर जाकर पीटें
अपने दुख का ढोल
हुआ दवा का टाइम अम्मा
उठ जा आँखें खोल।
आईं सारी जाँचें अब की
सचमुच अच्छी तेरी
मौत खड़ी है किस्मत को पर
जाने क्यों अब घेरी
हर रिश्ते की दौलत से भी
तू हमको अनमोल
हुआ दवा का टाइम अम्मा
उठ जा आँखें खोल।
हाय नदी अश्कों की अविरल
खूब यहाँ बहती है
एक सदी मन- भीतर गुमसुम
खोयी- सी रहती है
दिया वक्त ने खुशहाली के
जीवन में विष घोल
हुआ दवा का टाइम अम्मा
उठ जा आँखें खोल।
शोक यहाँ मरने का तेरे
मना नहीं सकते हम
जलने वाले जब खुश होते
बढ़ जाता अपना ग़म
निभा रहे हम मानवता से
फिर भी जुड़कर रोल
हुआ दवा का टाइम अम्मा
उठ जा आँखें खोल।
- उपमेंद्र सक्सेना एडवोकेट, बरेली
Tags:
काव्य
.jpg)