काव्य :
मतलब के रिश्ते नाते हैं
पूर्णिका
मतलब के रिश्ते नाते हैं इसपर नर क्यों इतराता है।
ईश्वर ही सच्चा साथी है,ये समझ नहीं नर पाता है।
आते सब लोग अकेले हैं,जाते सब लोग अकेले हैं,
यह जग के झूठे मेले हैं ,माया का खेल दिखाता है।
संसार प्रभु की माया है, नश्वर यह नर तन काया है,
कर्मों में स्वर्ग समाया है,यह धर्म कर्म सिखलाता है।
है कर्म हमारे हाथों में, फल कर्म भाग्य की बातों में,
बचके रहना है घातों में ,कर्तव्य सफल हो जाता है।
सत्संग,ग्रंथ में सार बहुत,भक्ति में हैं अधिकार बहुत,
मानव जीवन में भार बहुत,ये ही भव पार लगाता है।
निर्मल जीना सीखें जीना,बैचेन हुआ जो सुख छीना,
दुखियों के दुःख तुझे पीना,ऐसा जीवन सुख दाता है।
- सीताराम साहू'निर्मल', छतरपुर मप्र
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