अतंस के दो शब्द
जरुरी नही सब कुछ बताना और यह भी जरूरी नही छुपाना फिर भी मृगतृष्णा की भीड़ में कुछ तो है मृग नयन सा जो हर व्यक्ति को खुद में सम्मोहित करके रखा है ।
अपने भीतर कुछ तो मोह के धागे को लपेटे हुए
चुपचाप साथ चलने के लिए मजबूर किया है ।
यह स्वार्थ नही व ना ही समर्पण के भाव है बल्कि एक रिश्ता है जो केवल प्रेम है।
इस रिश्ते को स्वीकार करने में कोई झिझक या भार नहीं लगता बल्कि बिगड़ी हुई या बनी हुई हर परिवर्तित वक़्त में यह बिना कुछ कहे बस थामें हुए आगे आगे चलकर रास्ता दिखाने की कोशिश करता है ।
कभी टूटने पे माँ बनकर , बिखरने पर पिता की शक्ति व रुठने पे भाई बहन तो कभी मित्र लेकिन कभी छोड़कर या मुहं मोड़ कर नहीं जाता बल्कि एक अलौकिक व स्नेह से बांधकर चलता है और हरबार बिना कुछ कहे ही बोल देता है -
'मैं हूँ न पगली चिंता मत करो'
उम्र के बढ़ते हुए पड़ाव व सांसो की बनतीं बिगड़ती लय के साथ मन के अंदर एक अनजान डर बस ईश्वर से प्रार्थना करता है ,
अपने लिए नहीं बल्कि अपने उस साथी के लिए जिसके बिना जीना क्या एक कदम उठाना भी भूल गए होतें है क्योंकि रिश्तों की पाठशाला में कहते हैं माँ से बढ़कर कोई नहीं लेकिन पतिपत्नी तो अर्धनारीश्वर है । अतः यह तो ठीक वैसे ही है जैसे शरीर के दो हाथ पैर आंखे कान फिर शरीर व सांस की गतिविधियां तो एक दूजे के बिना मृत हैं ।
माँ जीवन है उसके बिना जग सुना है तो पत्नी जीवन सुत्रधार है लेकिन एक स्त्री के लिए तो उसका नाम गौत्र शहर भूख प्यास सब कुछ उसका पति है जिसके पीछे पीछे वह चलकर सब कुछ सहती झेलती बढ़ती जाती है । एक अलग महौल में पली बढी हुई फिर भी आपके महौल में आकर ठीक उस पौधे सा फलने फूलने लगतीं है जिसका जमीं मिट्टी ही नहीं अर्थ सब कुछ बदल जाता है ।
फिर इस बदलाव के प्रतिक्रिया में उस को बहुत कुछ बिना कुछ कहे सुनें भी झेलना पड़ता हैं ।
जो एक पति नहीं समझ सकता वह नहीं समझ पाता उन हवाओं व तपन को जो केवल उस को इसलिए मिलता है क्योंकि वह एक स्त्री नहीं बल्कि उस परिवार की प्रतिबिंब बनकर आई तो सही परन्तु ना जाने कब प्रतिद्वंद्विता के कतार में खुद को महसुस करने लगी।
उसके लिए माँ शब्द का मतलब वही था जो सभी के लिए होता है फिर भी जननी तो जननी होती है । यह बात वक़्त समझा देता है ।
मृगतृष्णा के पीछे पीछे दौडती हूई वह कभी रफ़्तार पकड़ लेतीं है लेकिन मंशा कभी भी गलत नहीं रखतीं क्योंकि जैसे कोई माँ नहीं चाहतीं उसका घर बिगड़े ठीक वैसे ही एक पत्नी रुपी स्त्री भी नहीं चाहतीं उसका घर टूटे ।
हां यह सत्य है, माँ के पास अनुभव है और पत्नी के पास खुले हाथ क्योंकि चावल के दाने उछाल कर आती बहू खुद को अर्पित कर चुकी होती है व उसे अब अपने खुले हाथों में सहेजने होते हैं विश्वास व प्रेम के मोती परन्तु क्या उस की कोशिश रंग ला पाती है ? नहीं न !
आखिर क्यों ?
इस प्रश्न का एक मात्र उत्तर है -
जिस दिन प्रत्येक घर में बहू के साथ साथ पत्नी का गृह प्रवेश होने लगेगा उसी पल से एक छत के नीचे संतोष से सबकुछ मिलने लगेगा ।
छिनने व छिपाने की मिट्टी पे वह पौधा खुद खिल जायेगा और खिल जायेगा एक स्त्री का मर्म जो केवल अतंस में अटक के रहता है।
एक ही व्यक्ति के लिए धड़कता , दो हृदयँ बस । रिश्ते अलग अलग है किसी का बेटा तो किसी का पति फिर भी, यह अलगाववादी सोच कैसे आ जाता है ।
बस एक बार हर स्त्री को सोचने की आवश्यकता है क्योंकि नई दिशा से महत्वपूर्ण हिस्सा दसों दिशाओं की होती है इसलिए माँ के अनुभव को माँ की भूमिका में ही रहने दीजिये उसे प्रतिद्वंद्वी ना बनाये क्योंकि कोई इस मृत्यु भूमि पे रहने नहीं आया है और वक़्त किसी के हाथों का खिलौना नहीं ।
वक़्त रहते हुए समझ जाये तो अच्छा वरना कोई ना कोई अपने अस्तित्व की कहानी शब्दों में लिखता रहेगा।
- अभिलाषा श्रीवास्तव गोरखपुर
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