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सरोकार : मुख्यमंत्री के गृहनगर में ही स्वास्थ्य विभाग में 41 प्रतिशत पद खाली - डाॅ. चन्दर सोनाने,उज्जैन



सरोकार : 

मुख्यमंत्री के गृहनगर में ही स्वास्थ्य विभाग में 41 प्रतिशत पद खाली

   - डाॅ. चन्दर सोनाने,उज्जैन

                मुख्यमंत्री डाॅ. मोहन यादव के गृहनगर उज्जैन में ही स्वास्थ्य अमले की भारी कमी है। कुल स्वीकृत 2,636 पदों में से 1,077 पद खाली पड़े हुए है। इस प्रकार जिले में स्वास्थ्य अमले में 41 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं। यही नहीं जिले में स्त्री रोग विशेषज्ञ 22 होना चाहिए, इसकी बजाय केवल 13 ही स्त्री रोग विशेषज्ञ काम कर रहे हंै।
       जिला स्वास्थ्य समिति और जिला पंचायत की साधारण की बैठक में प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार उज्जैन जिले में विशेषज्ञ चिकित्सकों के 112 पद स्वीकृत हैं। इसमें से केवल 47 ही कार्यरत हैं। 65 पद रिक्त हंै। इसी प्रकार स्त्री रोग विशेषज्ञ के 22 स्वीकृत पदों में से 13 पदों पर ही विशेषज्ञ कार्यरत हैं और 9 पद खाली पड़े हुए हंै। चिकित्सा अधिकारी के 235 स्वीकृत पदों में से केवल 122 पदों पर ही चिकित्सा अधिकारी कार्यरत हैं और 133 पद रिक्त हंै। नर्सिंग आॅफिसर के स्वीकृत 648 पदों में से 539 पद भरे हुए हैं और 109 पद रिक्त हैं। एएनएम के कुल स्वीकृत 445 पदों में से 304 पद ही भरे हुए हंै और 141 पद खाली पड़े हुए हैं। 
                      इसी प्रकार उज्जैन जिले में सीएचओ के स्वीकृत 220 पदों में से 211 पद भरे हैं और 9 खाली हैं। लेब टेक्नीशियन के 75 स्वीकृत पदों में से 44 पद भरे हुए हंै और 31 पद खाली पड़े हंै। फार्मासिस्ट ग्रेड 2 के स्वीकृत 107 पदों में से केवल 47 पद ही भरे हुए हंै और 60 पद खाली पड़े हुए हैं। ड्रेसर केे 68 स्वीकृत पदों में से 37 ही भरे हुए हैं और 31 पद खाली पड़े हंै। कम्प्यूटर आॅपरेटर के 8 पदों में से एक भी पद भरा हुआ नहीं हैं। सारे के सारे 8 पद खाली हैं। वाहन चालक के स्वीकृत 36 पदों में से केवल 9 पद ही भरे हैं। 27 पद खाली पड़े हैं। इसी प्रकार चतुर्थ श्रेणी के 614 पदों में से केवल 186 पद ही भरे हुए हैं और 428 पद खाली पड़े हुए हंै। दैनिक वेतन भोगी सफाईकर्मी के स्वीकृत 46 पदों में से एक भी पद भरा हुआ नहीं हैं। सारे के सारे पद खाली हैं। 
अब एक नजर उज्जैन के संजीवनी क्लीनिक पर भी डालते हैं तो पाते है कि इसकी भी सेहत खराब है। लोगों को घर के पास ही प्राथमिक चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध हो, इसके लिए शहर में 28 संजीवनी क्लीनिक के नए भवन बनाएं गए। 20 से 50 लाख रूपए तक की लागत से तैयार इन संजीवनी क्लीनिक के भवनों में राज्य शासन द्वारा डाॅक्टरों और जरूरी स्टाफ की नियुक्ति नहीं होने से अधिकांश क्लीनिकों में ईलाज ही नहीं हो पा रहा है, क्योंकि कई केन्द्रांे पर डाॅक्टर ही नहीं हैं। ऐसे में संजीवनी क्लीनिक में पदस्थ नर्स ही प्राथमिक र्दलाज और जांच कर रही है। इन क्लीनिकों पर रोजाना करीब सौ से दो सौ मरीज आ रहे हैं। किन्तु अधिकांश क्लीनिक पर डाॅक्टर नहीं होने से उन्हें निराशा ही मिलती है।
                      उज्जैन एक संभागीय मुख्यालय होने के नाते उज्जैन पर आसपास के जिलों से आने वाले गंभीर मरीजों की चिकित्सा का भी बड़ा जिम्मा रहता है। यहां मरीज इस उम्मीद से आते हैं कि उन्हें यहाँ बेहतर और त्वरित ईलाज मिलेगा। लेकिन धरातल पर हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। विभिन्न पदों पर जो भी अमला वर्तमान में मौजूद है उन पर मरीजों के ईलाज के साथ-साथ स्वास्थ्य विभाग की विभिन्न योजनाओं, सुरक्षित प्रसव, मातृ-शिशु मुत्युदर को नियंत्रित करने के साथ ही लगभग हर दिन लगने वाली वीआईपी और प्रोटोकाॅल ड्यूटी का भी अतिरिक्त बोझ रहता है। ऐसी हालत में वर्तमान में पदस्थ अमला और भी कम हो जाता है। 
यह तो हुई उज्जैन के स्वास्थ्य विभाग की हालत! उज्जैन के पास में और औद्योगिक नगरी इंदौर के हालात पर भी एक नजर डालते हंै तो पता चलता है कि इंदौर में 83 करोड़ की लागत से हुए अस्पताल के निर्माण के बाद भी वर्तमान में केवल 34 बेड पर ही मरीज भर्ती किए जा रहे हैं। पिछले कुछ दिन पहले ही प्रदेश के मुख्यमंत्री डाॅ. मोहन यादव ने इसी 300 बेड के जिला अस्पताल का लोकार्पण किया था। इससे उम्मीद थी कि धार रोड और आसपास के क्षेत्र के लोगों को एक ही परिसर में ईलाज की सभी सुविधाएँ मिल सकेगी तथा एमवाय अस्पताल पर मरीजों का दबाव कम होगा। लेकिन उद्घाटन के बाद भी इस अस्पताल को पूरी क्षमता से शुरू नहीं किया जा सका है। वर्तमान में यहां केवल 34 बेड पर ही मरीज भर्ती किए जा रहे है। अनेक स्वास्थ्य सेवाएं अभी ठप्प पड़ी है। ऐसी हालत में मरीजों की जांच, विशेषज्ञों की राय और गंभीर ईलाज वाले मरीजों को अब भी दूसरे सरकारी अस्पतालों में रैफर किया जा रहा है। 
                        हांलाकि इंदौर के इस अस्पताल के संचालन के लिए स्वास्थ्य विभाग भोपाल ने 165 डाॅक्टरों और कर्मचारियों की पदस्थापना की थी, लेकिन आदेश जारी होने के कुछ ही दिनों में आधे से ज्यादा डाॅक्टरों और कर्मचारियों ने अपने आदेश निरस्त करा लिए। इस कारण अस्पताल में हाल-फिलहाल मुख्य रूप से स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की सेवाएं ही संचालित हो पा रही है। इसी विभाग में 30 बेड पर भर्ती की वर्तमान में व्यवस्था है। अन्य विशेषज्ञ सेवाएं ठप्प पड़ी है। 
                        मुख्यमंत्री डाॅ. मोहन यादव के गृहनगर में और प्रदेश के प्रमुख औद्योगिक नगरी इंदौर के स्वास्थ्य विभाग के हालात ये बता रहे हैं कि हालत वाकई चिंताजनक है। इसलिए स्वास्थ्य विभाग की केवल चिकित्सा ही नहीं, बल्कि सर्जरी की आवश्यकता है ! इन दो शहरों के उदाहरण से सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है कि प्रदेश के अन्य जिलों में स्वास्थ्य अमले की क्या हालत होगी ? इसलिए मुख्यमंत्री को इस दिशा में नकेल डालने की आवश्यकता है, तभी व्यवस्था में सुधार हो सकेगा अन्यथा जो चल रहा है वैसा ही चलता रहेगा !
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देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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