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व्यंग्य :करिश्मा कैमरे का - देवेन्द्र कुमार रावत , भोपाल



व्यंग्य :

करिश्मा कैमरे का

 - देवेन्द्र कुमार रावत , भोपाल

                        आजकल किसी भी सुखद अवसर हो या दुखद, कैमरे की बहुत उपयोगिता हो गई है । क्योंकि कैमरा तो सुख-दुःख से परे रहकर अपना काम करता रहता है । किंतु इसका जो सदुपयोग होना था, उसकी अपेक्षा इसका दुरुपयोग ज़्यादा हो रहा है । इस संदर्भ में पहले हम विवाह समारोह की बात करें, तो वर-वधू दोनों भले ही प्यार से एक-दूसरे की तरफ न देखते हों, किंतु कैमरे और कैमरामैन की ओर उनका हंसता हुआ चेहरा अवश्य दिखाई देता है । फोटो में दोनों इतने खुश दिखते हैं कि ऐसा लगता है जैसे उनकी यह फोटो घर के म्यूजियम में रखने लायक है-क्या पता उनकी यह आखिरी हंसी हो ! दूसरे, वे ऐसी फोटो खिंचवाकर बताना चाहते हैं कि बाद में तो खिंचे-खिंचे चेहरे ही नजर आएंगे, इसलिए ऐसी सहज हंसती हुई स्मृतियां पुरातात्त्विक  रूप में सुरक्षित रखना आवश्यक है । पहले तो हमारी संस्कृति के अनुसार विवाह में गौरी-पूजन और गणेश-पूजन करते हुए, पाणिग्रहण के समय अग्नि को साक्षी मानकर चित्र खींचे जाते थे । इसमें पंडित जी का भी फोटो रहता था । किंतु, कुछ समय से जो फोटो खींचे जा रहे हैं , तब से न जाने यह कैमरा कितना नास्तिक होता जा रहा है कि बड़ी सावधानी से इन सब दृश्यों को काट देता है । वहीं अब विवाह के अवसर पर वरमाला के उपरांत रिश्तेदारों, परिजनों और समाज के लोगों की फोटो लेना भी अब एक रस्म बनती जा रही है । मंच पर परिजनों की भीड़ देखकर लगता है कि वर-वधु को गिफ्ट देने के साथ-साथ ह्रदय से आशीर्वाद भी देने आये हैं पर उनके हाव-भाव के फोटो        देखकर  ऐसा लगता है कि वे वर-वधू को आशीर्वाद देने नहीं सबके सब चाहते हैं कि यह प्रमाण रहे कि उन्होंने जो गिफ्ट व्यवहार में दी है, उसके प्रमाण-स्वरूप यह फोटो बहुत काम की होगी । दूसरे, जो नकद राशि या वस्तु व्यवहार में दी है, वह भविष्य में वापस मिलेगी ? या फिर पुराना दिया हुआ चुकता करने आए हैं । कैमरे ने विवाह-पूर्व (प्री-वेडिंग) फोटो खींचकर एक और करिश्मा कर दिखाया है । वर-वधू दोनों के फिल्मी अंदाज में खींचे गए फोटो को देखकर शर्म को भी शर्म आने लगी है, जबकि भारतीय संस्कृति में यह परंपरा कभी नहीं रही । इस संबंध में कैमरे का तर्क है कि विवाह के पूर्व परस्पर वर-कन्या का परिचय और आपसी समझ जरूरी है । लेकिन यह समझ और प्रेम जीवन भर बना  रहे, यह भी तो आवश्यक है । आजकल तलाक के बढ़ते आंकड़ों, घरेलू झगड़ों और हिंसा के कारण ऐसा नहीं लगता कि यह समझ काम आ रही है । फिर परस्पर एक-दूसरे को जानने के लिए क्या फिल्मी अंदाज में फोटो खिंचवाना जरूरी है ? क्या एक-दूसरे को जानने-समझने का यही एकमात्र तरीका रह गया है ? क्या विवाह के बाद भी ऐसी फोटो आएंगी ? कैमरे भाई विचारणीय यह है कि क्या फ़िल्मी नायक नायिकाओं में से कितनों का वैवाहिक जीवन सुखी रहा है ? कुछ ऐसे प्रश्नचिह्न हैं, जिनका उत्तर कैमरा स्वयं नहीं देता। पर यह तो समझ में आ ही रहा है कि दो लोगों के प्रेम की संकरी गली में, ऐ कैमरे ! तुम कहाँ बीच में टपक पड़े ? इसमें तो जा में दो न समायकी कहावत की तुमने पूरी तरह से धज्जियां ही उड़ा दीं ।अब दुखद प्रसंग की चर्चा करें तो हम देखते हैं कि जाने वाला तो दुनिया छोड़कर चला गया, किंतु उसे श्रद्धांजलि देते वक्त लोगों की नजर उस व्यक्ति के प्रति नहीं रहती जो चला गया है, बल्कि पूरी तरह से कैमरे की तरफ होती है । काश! यदि वह व्यक्ति कुछ समय बोल सकता तो कहता कि, "यार ! मैं थोड़े समय बाद दुनिया को छोड़कर चला जाऊँगा, आज तुम्हें मेरे मरने पर भी फोटो खिंचवाने की पड़ी है पर तुम जान लो कि यह दुनिया न किसी की है और न किसी की रहेगी । तुम सब ये क्यों नहीं समझ पा रहे हो " केवल चित्र खिंचवाने से स्मृतियाँ अमर नहीं रहतीं; क्योंकि ये चित्र तो आखिरकार एक न एक दिन फीके पड़ ही जाते हैं । पर जिनका चरित्र अच्छा होता है, उनके चरित्र के चित्र हर हृदय में अंकित रहते हैं । कैमरे जी जब तुम दुनिया में नहीं थे, तब क्या होता होगा, यह कहा नहीं जा सकता । पर यदि तुम अतीत में होते और तुमने मानवता के संहार के चित्र खींचे होते, तो आज उस समय की असलियत उजागर होती और इतिहास बदला हुआ होता । खैर, आज तुम हो, तो भी तो... मानो लोग कह रहे हों-कैमरा जी, हम तो यह श्रद्धांजलि तुम्हारे ही कारण देने आए हैं, यदि तुम न होते तो हम भी यहाँ नहीं आते ।देखा जाए तो हमने इस अवसर पर, इस नश्वर संसार में तुम्हारे ही कारण दुःख के अवसर पर पर हंसना सीखा है; क्योंकि एक तुम ही हो जो हमारा हंसता हुआ चेहरा पसंद करते हो । बाकी दुनिया वालों को तो हमारे हंसते हुए चेहरे को देखकर जलन होती है । काश ! तुम्हारी आंगे और पीछे दो आंखें इस तरह से होतीं, कि तुम भी एक साथ हमारी ओर हमारे हँसते हुये चेहरे को देखकर जलने वाले की फोटो भी एक साथ खींच सकते । खैर, अभी तो हम यही कह सकते हैं कि तुम्हारी उपयोगिता तो है । किन्तु लोग तुम्हारा कितना दुरुपयोग कर रहे हैं, यह कहा नहीं जा सकता । फिर भी तुम्हारे लिए हमें यह गाना याद आ रहा है-हमें और जीने की चाहत न होती, अगर तुम न होते ।

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देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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