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रक्षासूत्र और भारतीय संस्कार परम्परा: प्रतीकों से संस्कृति संरक्षण - डाॅ. राकेश सक्सेना , एटा



रक्षासूत्र और भारतीय संस्कार परम्परा: प्रतीकों से संस्कृति संरक्षण

 -  डाॅ. राकेश सक्सेना , एटा

       रक्षासूत्र रक्षा करने वाला वह धागा है,जो नकारात्मक ऊर्जा, संकटों व बुरी नज़र से बचाता है। यह मनुष्य को धर्म, सत्य और अच्छे मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। वेदों में इसे रक्षाबंधन भी कहा गया है। पौराणिक कथा के अनुसार प्रथम प्रसंग में जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि माँगी तब दानवराज बलि, महाबली की पत्नी विंध्यावली ने बली की रक्षार्थ उनके हाथ में रक्षासूत्र बाँधा था तथा दूसरे प्रसंग देवासुर संग्राम में जब इन्द्र कमज़ोर पड़ गए तो इन्द्राणी शची ने मंत्रों से अभिसिंचित करके श्रावण शुक्ला पूर्णिमा को इन्द्र की कलाई पर रक्षासूत्र बाँधा और उनकी विजय हुई। इस धागे को दाहिने हाथ की कलाई पर बाँधा जाता है क्योंकि दाहिना हाथ कर्म का प्रतीक है। श्रावण शुक्ला पूर्णिमा की तिथि को मनाया जाने वाला रक्षाबंधन पर्व का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। यह केवल बहन-भाई का त्यौहार ही नहीं है अपितु गुरू अपने शिष्य को, ब्राह्मण अपने यजमानों को और पत्नी अपने पति को भी रक्षासूत्र बाँधती है। आज के समय में रक्षासूत्र एक सुरक्षा कवच है। यह सुरक्षा बाहरी संकट नहीं है। भारतीय चिंतन में रक्षा का व्यापक अर्थ धर्म, सत्य,कर्तव्य,सम्बन्ध,मर्यादा, प्रकृति और मानवीय मूल्यों की रक्षा भी है। इसी प्रकार ' सूत्र ' शब्द केवल धागे का नाम नहीं, वह जोड़ने,बाँधने और सम्बन्ध स्थापित करने का प्रतीक है।
     भारतीय संस्कृति में संस्कार का अर्थ कर्मकांड नहीं अपितु मनुष्य के जीवन को परिष्कृत करने, उसे सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ने और जीवन-मूल्यों के प्रति जागरूक बनाने की एक प्रक्रिया है। जन्म से मृत्यु तक हमारे यहाँ अनेक संस्कारों का उल्लेख मिलता है,जिनमें मंत्र, अग्नि, जल, पुष्प,अक्षत, दीप, तिलक और सूत्र का प्रयोग होता है, जो अनुष्ठान को सुन्दर बनाने के साथ अमूर्त विचारों को मूर्त रूप प्रदान करते हैं। दीपक ज्ञान का, जल शुद्धता और जीवन, अग्नि पवित्रता और साक्षित्व,अक्षत पूर्णता,मंगल, तिलक शुभता  व सूत्र सम्बन्ध, संकल्प और संरक्षण का प्रतीक है। रक्षासूत्र इसी संकल्प को शरीर पर एक प्रतीक के रूप में धारण कराता है। जब किसी व्यक्ति की कलाई पर सूत्र बाँधा जाता है तो वह सूत्र उसके संकल्प की याद दिला सकता है कि मैं अपने कर्तव्य के प्रति सजग रहूँ, सम्बन्धों का सम्मान करूँ, सत्य और सदाचार के मार्ग पर चलूँ और अपने परिवार और समाज के प्रति उत्तरदायी रहूँ। इस दृष्टि से रक्षासूत्र बाहरी बंधन नहीं, आंतरिक अनुशासन का प्रतीक है।
      रक्षासूत्र की सर्वाधिक लोकप्रिय सामाजिक अभिव्यक्ति रक्षाबंधन पर्व में दिखाई देता है। बहन द्वारा भाई की कलाई पर राखी बाँधना पारिवारिक संस्कृति में स्नेह, विश्वास और पारस्परिक उत्तरदायित्व का प्रतीक है। राखी बाँधने की परम्परा परिवार को स्मरण कराती है कि रक्त सम्बन्ध केवल जैविक सम्बन्ध नहीं हैं,उनमें भावनात्मक दायित्व भी निहित है। यूँ तो इस पर्व की छवि इससे कहीं व्यापक है। भारतीय परम्परा में रक्षा का दायित्व केवल पुरुष का नहीं माना जा सकता। माता परिवार की रक्षा करती है, पिता परिवार का पालन करके दायित्व निभाता है, बहन भाई के सुख-दुःख में साथ देती है और भाई, बहन के सम्मान और सुरक्षा का ध्यान रखता है, मित्र भी संकट में सहायता करते हैं। इसलिए आधुनिक संदर्भ में रक्षासूत्र को परस्पर संरक्षण और सहयोग का प्रतीक बनाना अधिक सार्थक होगा। भारतीय परिवार व्यवस्था का आधार भावनात्मक सम्बन्ध और परस्पर उत्तरदायित्व भी रहा है अत: रक्षासूत्र पारिवारिक चेतना का दृश्य प्रतीक भी है, जो सम्बन्धों को व्यवहार में जीवित रखने का अवसर देता है। आज संयुक्त परिवारों का आकार घट रहा है,इस स्थिति में रक्षाबंधन जैसा पर्व परिवार के सदस्यों को पुन: जोड़ने का अवसर प्रदान करता है। रक्षासूत्र सामाजिक समरसता, प्रकृति संरक्षण, लोक संस्कृति, पर्यावरणीय चेतना, स्त्री सम्मान के मध्य सेतु बन सकता है।
      किसी भी सांस्कृतिक प्रतीक का महत्व उसके भौतिक अस्तित्व से अधिक उसके अर्थ में होता है। यदि रक्षासूत्र केवल कलाई पर बँधा धागा बनकर रह जाए तो उसकी सांस्कृतिक शक्ति सीमित हो जाती है ,यदि वह  सम्बन्धों की याद दिलाए, कर्तव्य का बोध कराए, परिवार को जोड़े, सामाजिक समरसता बढ़ाए, प्रकृति संरक्षण को बढ़ावा दे, स्त्री सम्मान का संदेश दे और मानवीय मूल्यों की रक्षा का संकल्प जगाए तो वह जीवंत संस्कृति का प्रतीक बन जाता है एतदर्थ रक्षासूत्र भारतीय संस्कृति की उस प्रतीकात्मक परम्परा का प्रतिनिधि है, जिसमें छोटी-सी वस्तु के भीतर व्यापक जीवन-दर्शन को अभिव्यक्त करने की क्षमता है। धागा भौतिक रूप से कमजोर हो सकता है किन्तु जब वह विश्वास, प्रेम, संकल्प और उत्तरदायित्व से जुड़ता है तो उसका सांस्कृतिक अर्थ अत्यन्त शक्तिशाली हो जाता है। रक्षासूत्र इसी जीवंत सांस्कृतिक स्मृति का सुन्दर प्रतीक है। आज आवश्यकता है कि इस पर्व के भीतर छिपे मानवीय मूल्यों को समझें और उन्हें वर्तमान जीवन की आवश्यकताओं से जोड़ें!!
                     
 - डाॅ.राकेश सक्सेना, 
पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 
68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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