काव्य :
पानी खेलें
आओ, घुटनों तक पानी, खेलें
लड़कपन और जवानी खेलें
बारिश देखो,हमे बुलाती
घर से निकलकर, पानी खेलें
आओ घुटनों तक,पानी खेलें
नाव बहाएं,भीग भीग जाएं
हम हर ही शैतानी खेलें
सबको घेरें,ले ले फेरे
चाची,चाचा,नानी खेलें
आओ घुटनों तक पानी खेलें
आम की डाल पर झूले पड़े हैं
झूम के नाचें,झूला झूलें,
पेंग बढ़ाएं, उड़ उड़ जाएं
मन की सब,मनमानी खेलें
आओ घुटनों तक पानी खेलें
छाते और बरसाती फेक दें
झमझम,घोर घोर रानी खेलें
अब के बरस फिर बारिश बुलाती
*ब्रज*,बूंदों की सभी कहानी खेलें
आओ घुटनों तक पानी खेलें
- डॉ ब्रजभूषण मिश्र , भोपाल
Tags:
काव्य
.jpg)