काव्य :
निशानी
चाहतें तो जरुरतों की भेंट चढ़ गईं
फकत प्यार की निशानी रह गई
फूल गुलाब के कभी दिये थे प्यार में
फकत सूखी पत्तियाँ निशानी रह गईं
स्याह हरुफ भी फीके होने लगे धीरे-धीरे
फकत पृष्ठों में महक-ए -निशानी रह गई
जिम्मेदारियाँ उठाते उठाते उम्र ढल गई
हाँ यादों की डायरी में ,इश्क की निशानी रह गई।
उम्र तो दिल लगाने की कब की गुजर गई
फकत दिल की लगी ,की कहानी रह गई।
-डा.नीलम ,अजमेर
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