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जनपक्षधरता की मुखर अभिव्यक्ति है पत्रकारिता - पद्मा मिश्रा ,जमशेदपुर



जनपक्षधरता की मुखर अभिव्यक्ति है पत्रकारिता 

   -  पद्मा मिश्रा ,जमशेदपुर

       समाज के विस्तृत फलक पर दिन प्रतिदिन चित्रित होती हुई जीवन की विविध अभिव्यक्तियों एवं आस पास की घटनाओं पर एक शोध परक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हुई एक मुखर आवाज है पत्रकारिता। वस्तुतः पत्रकारिता जन भावनाओं एवं यथार्थ की सहज अभिव्यक्ति का माध्यम तो है ही वह सामाजिक मुद्दों पर यथार्थवादी व सजीव चित्रण भी कर पाने में मुखर होती है। पत्रकारिता समाज का दर्पण भी है जिसमे प्रतिबिंबित होते और बदलते सामाजिक मूल्यों ,घटनाओं, एवं सामाजिक सरोकारों का सही सही निष्पक्ष मूल्यांकन संभव हो पता है। पत्रकारिता एक दायित्व भी है, जिसकी पूर्ति समाज में ही हो सकती है। यह समाज से विमुख रह कर केवल काल्पनिक सच्चाईयों एवं नकली बाजारवाद के बाल पर कभी पनप नहीं सकती। मेरे विचार से वह सच्ची पत्रकारिता भी नहीं है जो केवल उपभोक्तावादी संस्कृति को बढ़ावा देती हो। हाँ, समाज के बदलते स्वरूप से उसे प्रभावित होना ही पड़ता है  यह मै मानती हूँ। भारत एक लोकतान्त्रिक राष्ट्र है और लोकतंत्र का सही अर्थ महज सम्पूर्ण आजादी से नहीं लिया जाता क्योंकि बिना सूचना क्रांति के लोकतंत्र बेमानी है।

'हंस' के संपादन काल में प्रेमचंद का यह मानना था क़ि '' पत्रकारिता एक मिशन की तरह होनी चाहिए,जो अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वाह पूरी निष्ठा से कर सके. वस्तुतः पत्रकारिता, निर्भीक ,निडर,व् निष्पक्ष होनी चाहिए “ घटनाओं को उनके सही सही विवेचन निष्कर्ष के साथ प्रस्तुत कर समाज को एक सन्देश देना भी पत्रकारिता का प्रधान नियम है। 
यह नीड़ मनोहर कृतियों का,
यह विश्व बना रंगस्थल है।
है परंपरा लग रही यहाँ 
ठहरा जिसमे जितना बल है। 
    पर सच्ची पत्रकारिता इस होड़ में न उलझ कर समाज के प्रति निहित कर्तव्यों का निर्वहन कर सके तभी उसका महत्त्व है अन्यथा नहीं। हमारे सामने गणेश शंकर शुक्ल, लाला लाजपत राय,तिलक,शिवप्रसाद गुप्त,विष्णु पराड़कर जैसे उदाहरण हैं जिन्होंने पत्रकारिता को एक नई दिशा प्रदान कर ज्वलंत क्रांति व चेतना का सूत्रधार बनाया था. और अंग्रेजी प्रशासन की हिला दी थी। दबी कुचली मानसिकता वाले भारतीयों की विचारधारा ही बदल दी थी। हमारे समाज में व्याप्त दहेज़ हत्याओं,कन्या भ्रूण हत्याओं नारी उत्पीडन के खिलाफ चल रहे आन्दोलनों को मीडिया की शक्ति ने ही सफलता के शीर्ष पर ले जाने का कार्य किया है।आज ये ज्वलंत मुद्दे पत्रकारिता की मदद से ही जन समर्थन और चर्चा का विषय बने हैं। पत्रकारिता भी कई मुद्दों पर भारतीय महिलाओं और सामाजिक संगठनों के साथ कदमताल कर रही है।संघर्ष की राह में हम अकेले नहीं है यह भी उन्होंने सिद्ध किया है परन्तु उल्लेखनीय बात यह है क़ि केवल फैशन,ग्लैमर या बाजारवाद से उपजी उपभोक्ता संस्कृति  पर आधारित खबरों को ही हम सच्ची पत्रकारिता नहीं कह सकते जैसा कि आज की पत्रकारिता का बदलता स्वरुप सामने है बल्कि अपनी सच्ची ख़बरों सही आकलनों, खोज और निष्कर्षों के आधार पर जनता की आवाज बनना ही सच्ची पत्रकारिता है। चाहे वह नीतीश कटारा कांड हो या हेतल धनञ्जय काण्ड,राजीव गांधी की हत्या से उपजे मर्मान्तक सवाल हों या चौरासी के दंगों से लेकर पाकिस्तान में सरबजीत की फांसी का मामला हो, पत्रकारों ने अपनी भूमिका का सार्थक निर्वाह भी किया है। अभी हाल ही में घटित आरुषि हत्याकांड के परिप्रेक्ष्य में यह भूमिका शायद सही ढंग से नहीं निभाई गयी वह पुलिस ,प्रशासन,व् सामाजिक दबाव का शिकार होकर रह जाती यदि पत्रकारों ने स्वयं आगे आकर एक अभियान के तहत सही रास्ता नहीं दिखाया होता यहाँ इसका सार्थक पहलू यह रहा क़ि इस काण्ड से जुड़े सभी तथ्यों गवाहों और परिस्थितियों से पूरा देश अवगत हो सका। कभी कभी पत्रकारिता संकलित आकलनों और सूचनाओं का प्रस्तुतीकरण बन कर रह जाती है । वर्तमान समाज में घटित अनेक घटनाक्रम आज भी केवल पत्रकारिता की झूठी सच्ची जानकारी के अभाव में समाज को दिग्भ्रमित कर रहे हैं। बार बार एक ही समाचार को चटपटे ढंग से जनता के सामने इस तरह परोसना कि जनाक्रोश बढ़  जाता है। नारेबाजी गुटबाजी आरोपों -प्रत्यारोपों  की झड़ी लग जाती है । कुछ दिनों तक मुद्दे गरमाये रहते हैं फिर एक शांति तूफान से पहले की शांति। परन्तु कुछ पत्रों एवं दृश्य मिडिया ने सचमुच अपनी जिम्मेदारी निभाई है उन्होंने एक सशक्त जन चेतना का निर्माण किया है औ सामाजिक सरोकारों में पत्रकारिता के नए मान दंड तलाशे हैं  वे निश्चित साधुवाद के पात्र हैं। ''दो राह समय के रथ का घर घर नाद सुनो।

 'समय सचमुच तेजी से बदल रहा है, जन-मन की क़ातर पुकार उनकी समस्याओं सामाजिक मुद्दों से जुड़े सवाल आतंक,अनाचार, गरीबी, दहेज़ जैसी बुराईयों के खिलाफ भी पत्रकारिता की आवाज उठी है।  जिससे आज जनता की आवाज को दबा पाने का साहस किसी में नहीं रह गया है। आज की कर्मठ पीढी भी समाज के विकास का आधार भी पत्रकारिता को ही मानती है.मै एक आवाज हूँ,आने वाले 'कल की । समय के पृष्ठों पर अंकित ,पढो मेरी कहानी।
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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