काव्य :
राष्ट्र के 80 वें स्वतंत्रता पर्व पर,
देश के सारे दुश्मन सुन लें....
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इंजी. अरुण कुमार जैन
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प्राणों का उत्सर्ग कर दिया,भारत माँ के आँचल में,
सुख,सुविधायें सारी छोड़ी,
कूद पड़े रण आंगन में.
मां,पत्नी, बेटी की ममता, उन्हें तनिक न बाँध सकी,
पिता,भाई व पुत्र प्रेम भी,
राष्ट्र प्रेम से बड़ा नहीं.
शीश कटा माँ के चरणों में,
हम सब पर उपकार किया,
उन्हीं शूरवीरों के बल पर,
स्वतंत्रता उपहार मिला|| भारत मां शरणम....
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रोटी, घर,कपड़े व शिक्षा, रोजगार व स्वास्थ्य मिला,
श्रेष्ठ जनों ने किये यत्न सब,
नव विकास का द्वार खुला,
नित्य नए उद्योग यहां पर,
ज्ञान, विज्ञान प्रगति करता, आज विश्व में आगे भारत,
कीर्ति,यश प्रतिदिन बढ़ता,
कुछ वैरी भी साथ हमारे,
जिन्हें न यश सुख भाता है,
हिंसा,व्यसन, विनाश,विध्वंस का,नशा उन्हें नित आता है.
राष्ट्र प्रेम हर मन......
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मुजाहिदीन, खालिस्तानी, अलकायदा जैस विनाश करें,
बलात्कार,हिंसा जिहाद व, तोड़ फोड़ में रचें,बसें,
पतित कई है भारत भू पर, षड्यंत्र जो करवाते हैं,
नागनाथ व सांप नाथ मिल,
देश रसातल लाते हैं,
आओ साथ बढे,मिल इनका,
हम सब पर्दाफाश करें,
आस्तीन के सांप देश के, मिलकर आज विनाश करें|| पापी हों नष्टम.....
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कर्तव्य निष्ठ हों,शासक,
अफसर,शिक्षक, डॉक्टर, धर्म गुरु,
इनके साथ चलें सब मिलकर, सृजन, प्रगति अध्याय शुरू,
ऋषभदेव प्रभु,राम,कृष्ण,
वीर शिवा,प्रताप महान,
तिलक, भगत, आजाद, नेताजी सावरकर से आभावान,
शांति,वीर, गुरु विद्यासागर, इनके पथ पर सदा चलें,
विश्वगुरु के पद पर अपने, भारत को आसीन करें|| राष्ट्र प्रगति हर मन......
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हिमगिरी के उत्तउंग शिखर से, भारत की हुंकार यही,
देश के सारे दुश्मन सुन लें,
उनका है संहार अभी,
रहें राष्ट्र में राष्ट्र भक्त बन,
नेह, प्रेम, विश्वास भरें,
बढ़ें सृजन के पथ पर प्रतिपल,
रामराज्य साकार करें,
मीरजाफर, क़ासिम, यारलुत्फ खां, उनसबका होगा संहार,
स्वातंत्रत्य के महापर्व पर, होगा राष्ट्र का पुनरुद्धार,
सतत प्रगति, उत्थान, विजय के, नित्य खुलेंगे, अभिनव द्वार.
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