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समीक्षा : दीपक गिरकर के उपन्यास 'स्टेलमेट' में हारती नही है नायिका माधवी : लेती है स्वयम्भू ढोंगी बाबा से बदला



उपन्यास समीक्षा : 

दीपक गिरकर के उपन्यास 'स्टेलमेट' में हारती नही है नायिका माधवी : लेती है स्वयम्भू ढोंगी बाबा से बदला 

- सरोजिनी नौटियाल, देहरादून 

  शतरंज की बिसात की तरह जिंदगी की बिसात पर भी स्टेलमेट – अनिश्चय, अनिर्णय, किंकर्तव्यविमूढ़ता - की स्थिति से हम कई बार टकराते हैं। शतरंज में मैच ड्रा हो जाता है। और भी कई विधियाँ हैं, तर्क हैं, तरीके हैं खेल को किसी निष्कर्ष तक पहुँचाने के। लेकिन जिंदगी का स्टेलमेट बहुत हठी होता है। महाभारत के युद्ध में अर्जुन जैसे योद्धा तक ने हथियार डाल दिए थे। कृष्ण जैसे योगेश्वर को आना पड़ा था अर्जुन को अनिश्चय – स्टेलमेट से बाहर निकालने के लिए। सामान्य जन भी जब आगे निकलने के अपने प्रयासों की निरर्थकता और निष्फलता से आशा खोने लगता है तो अर्जुन की तरह हथियार डाल देता है या फिर अपना योगेश्वर स्वयं बन जाता है। समय पर छोड़ दो, ईश्वर पर छोड़ दो, जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए, कर्म, प्रारब्ध, होनी, ईश्वर की मर्जी – जैसे आश्रयों में शरण ले लेता है।
लेकिन लेखक दीपक गिरकर के ‘स्टेलमेट’ की नायिका माधवी ने अपनी राह में आने वाले हर स्टेलमेट को चुनौती दी। उसने कभी भी किसी भी प्रकार के मार्ग- अवरोधक पर अपने कदमों को ठिठकने नहीं दिया। मेधावी और परिश्रमी छात्रा माधवी का जीवन दर्शन और जीवन दृष्टि शुरू से ही बहुत स्पष्ट, लक्ष्यभेदी और रचनात्मक रही है। उसके अपने निर्णय हैं मगर वह सबको साथ लेकर चलने वाली भारतीय संस्कारों को जीने वाली स्त्री है। वह बेटी है, पत्नी है, बहू है, माँ है। और, रिश्तों की इन भूमिकाओं से परे वह एक व्यक्ति भी है। वह कर्मयोगी है। गीता के कर्मयोग को उसने जीवन में उतारा। कर्म लक्ष्यपरक ही होता है लेकिन फलासक्ति नहीं होनी चाहिए – गीता ज्ञान के संदेश के साथ उपन्यास के पन्ने खुलने से जो कथा शुरू होती है, वह पूर्वदीप्ति में चलती हुई क्रमशः माधवी और श्रीनिवास के कैम्पस प्रेम, कोर्ट मैरिज, आंशिक पारिवारिक स्वीकृति, गृहस्थ, बच्चे...के सामान्य दृश्यों से होते हुए पुत्री अनु के मूक-बधिर होने, पति श्रीनिवास के विवाहेतर स्त्री प्रसंग में लिप्त हो जाने, उनके खेदजनक असामयिक निधन और अन्ततः अनु की दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु जैसे चुनौतीपूर्ण और अवसादजनक व्यतिक्रमों के जटिल से जटिलतर दृश्यों से गुजरती है। 
कथानक में बहुत कुछ चौंकाता है। जीवन की परिपक्व अवस्था में एक जिम्मेदार पद पर कार्यरत श्रीनिवास की गैरजिम्मेदार हरकत रोष पैदा करने से अधिक चौंकाती है। इसी प्रकार विज्ञान की अध्येता रही, उच्च बौद्धिक स्तर की माधवी का आशाराम बापू के प्रतिरूप महर्षि सुब्बाराव के पाखंड का शिकार बन जाना भी कम हैरान नहीं करता। लेकिन यहाँ पर यह दिखाने का प्रयास कहा जा सकता है कि मनुष्य के चित्त पर भौतिक लालसाओं और आशंकाओं का वशीकरण इतना बलवान होता है कि अपने समस्त तर्कों को दरकिनार कर व्यक्ति कथित त्रिकालदर्शी बाबाओं की शरण में चला जाता है। हालांकि माधवी जैसे मजबूत चरित्र के साथ ऐसी दुर्घटना सहज स्वीकार्य नहीं है। फिर भी संदेह का लाभ दिया जा सकता है।
लेकिन जो बात सबसे अधिक नागवार गुजरी, वह है - श्रीनिवास के अवनि के मोहपाश में फंसने की उसकी चारित्रिक दुर्बलता के सापेक्ष माधवी का अपनी यौनभूमिका और दैहिक क्षमता का मूल्यांकन करना । ‘... स उम्र में भी मेरी जवानी ढली नहीं थी... उस आयु में भी मेरे स्तन शिथिल नहीं हुए थे, क्योंकि मैं प्रतिदिन प्रातः पाँच बजे उठ कर योगाभ्यास करती थी ’- भी मन का जायका बिगाड़ता है, सुरुचिपूर्ण नहीं लगता। यह स्त्री को देहभर करना लगा। पति-पत्नी का रिश्ता केवल इतना भर नहीं होता।
हाँ, यह अवश्य है कि इन अंतरालों के बावजूद कथानक में अपना प्रवाह है, कसावट है और तरल संवेदना है। माधवी एक मजबूत चरित्र बन कर उभरी। अपने बच्चों विशेषकर अपनी दिव्यांग बेटी के लिए उसने रात-दिन एक कर दिया। शतरंज का खेल उसके और उसकी बेटी के लिए जीने की प्रेरणा बन गया। शतरंज के खेल के जरिए पाठक के जीवन दर्शन को भी नए आयाम मिलने लगते हैं। जिस ढंग से उपन्यास में शतरंज की चालों, संभावनाओं और जोखिमों का विश्लेषण और प्रस्तुतीकरण किया गया है, वह बड़ा प्रभावित करता है। पाठक शतरंज की बिसात पर मोहरों की शक्ल में अपने जीवन की चुनौतियों को एक नए अंदाज से देखने के लिए उत्सुक हो जाता है। वह भी माधवी की तरह अपने स्टेलमेट के भँवर से निकलने के लिए प्रेरित हो जाता है। शतरंज के खेल का पूरा परिदृश्य – खेल की बारीकी, अभ्यास, समझ, मानसिक बल, धैर्य, आक्रामकता, अनुशासन, नियम, प्रतियोगिता, टूर्नामेंट, हार-जीत, ड्रा, किसी चाल का न बचना – स्टेलमेट – सब उपन्यास के एक बड़े हिस्से पर काबिज है। लेकिन अनावश्यक नहीं लगता। लेखक ने इस खेल के ब्याज से जीवन में आने वाली ऐसी स्थितियों को मूर्तमान किया है जब हमारे पास चलने के लिए कोई चाल नहीं बचती। हम लाचार हो जाते हैं। लेकिन साथ ही माधवी के कर्मयोगी चरित्र से जीवन की हर बाधा को पार करने का दृष्टांत भी सम्मुख रखा। माधवी ने अपने प्रेम विवाह में आने वाली अड़चन, पारिवारिक असहमति को एक तरफ कर श्रीनिवास से विवाह किया। अपनी शालीनता और कर्तव्यपरायणता से ससुराल का दिल जीत लिया। पुत्री के मूक-बधिर पैदा होने की जटिलता और नैराश्य को शतरंज के अभ्यास से अनन्त-असीम संभावनाओं में बदल दिया। ढलती जवानी में पति के परस्त्रीगमन जैसी हृदय को विदीर्ण कर देने वाली हरकत से हैरान-परेशान होते हुए भी बेटी को शतरंज की दुनिया की ऊँचाइयों तक ले जाने वाले अपने प्रयासों में जरा भी कोताही नहीं की। और, अन्ततः बेटी के हत्यारे को माकूल जवाब देने के लिए वह अदालती कार्यवाहियों से उपजे स्टेलमेट को कानून अपने हाथ में लेकर दूर कर देती है। अदालत से मिली सजा से न पीड़ित को मुक्ति मिल रही थी और न ही अभियुक्त को पश्चात्ताप स्पर्श कर पा रहा था – ऐसा स्टेलमेट अपनी होनहार पुत्री को खो चुकी माँ को मंजूर नहीं था।
पुत्री के जाने के साथ ही माधवी के जीवन से और उपन्यास से शतरंज का खेल खतम हो जाता है मगर उसकी चाल अधूरी रह जाती है और जिंदगी की बिसात पर पसर जाता है - स्टेलमेट।
लंबी, थकान भरी और ऊबाऊ अदालती कार्रवाई के बाद न्याय के पक्ष में जो फैसला आया वह  निष्प्राण लगने लगा। अभियुक्त सुब्बाराव को मिले सश्रम आजीवन कारावास के दंड की तब धज्जियाँ उड़ने लगीं जब सुब्ब!राव बार-बार पैरोल पर जेल से बाहर आने लगा। आश्रम में अपने उसी वैभव, अहंकार और अनुयायियों से घिरी उसकी दिनचर्या में न कोई अंतर आया और न आरोपसिद्धि का उसके मुखमंडल में कोई शर्म या पछतावा दिखा। ऐसे में अपनी युवा पुत्री को असामयिक खो चुकी माँ के हृदय की आग कैसे शांत होती! कथा में इस दारुण प्रकरण के जरिए कथाकार ने भारतीय दंड प्रक्रिया की असंतोषजनक और मन को क्षुब्ध करने वाली अवस्था को भी उजागर किया है । यह प्रश्न भी उठना लाजिमी है कि –
‘क्या कानून की दृष्टि सबके लिए समान है? जब सामान्य नागरिक छोटी- सी भूल के लिए वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा करता है और प्रभावशाली व्यक्ति बार-बार रियायतें प्राप्त कर लेता है, तब न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता संदेह के घेरे में आ जाती है।’
तभी कहा जाता है कि न्याय होना ही पर्याप्त नहीं है, न्याय होता दिखना भी जरूरी है। ऐसे में माधवी वह कदम न उठाए तो क्या करे! उसके लिए ‘अनु की देह तो दफन हो गई पर रूह का क्या? रूह अब भी वहीं है। उसी शतरंज की बिसात पर। न्याय का इंतजार करते हुए। अपनी मुक्ति की राह देखते हुए।’ 
अदालत से माधवी को यह मुक्ति मिलती नजर नहीं आ रही थी। आखिर में दिवंगत बेटी की रूह की मुक्ति का बीड़ा भी उसने उठा लिया। भले ही व्यवस्था इसे कभी मंजूरी नहीं देगी लेकिन अपना सब कुछ हार चुकी माँ को किसी की मंजूरी की अपेक्षा भी नहीं थी। अपराधी सुब्बाराव के दोनों हाथों को काटने के बाद उसने थाने में जाकर आत्मसमर्पण कर दिया - ‘अधिकारियों को उसकी आँखों में अपराध नहीं, एक ठहरी हुई राख दिखी।’ जहाँ तक उसका सवाल है तो वह तो हार-जीत, हर्ष-विषाद को बहुत पीछे छोड़ चुकी थी। ऐसा करके वह बस अपने स्टेलमेट से आगे निकल आई थी और यही बात उपन्यास को विशेष बना देती है।
स्त्री संघर्ष, स्त्री अस्मिता और व्यवस्थाजन्य खामियों से जूझते व्यक्ति की मनोदशा का सादृश्य शतरंज की बिछी बिसात पर चाल और चाल अशेष की स्थिति से बिठाने जैसी  कथावस्तु से बुने उपन्यास ‘स्टेलमेट’ में पाठक को एक नयापन लगेगा। जहाँ तक शिल्प की बात है तो कथा वाचन शैली में वर्णित उपन्यास ‘स्टेलमेट’ का कथा प्रवाह कहीं अवरुद्ध नहीं होता है। भाषा साफ-सुथरी है। सरल-सहज है। सीधी-सपाट भाषा-शैली में विन्यस्त नवीनता लिए ऐसे अर्थपूर्ण कथ्य को किसी चमत्कारपूर्ण-अलंकृत शिल्प की आवश्यकता भी नहीं है। न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित उपन्यास ‘स्टेलमेट’ के लिए लेखक दीपक गिरकर को हार्दिक बधाई व शुभकामनाएँ।

 - सरोजिनी नौटियाल
176, आराघर, देहरादून – 2480011
मो. 9410983596
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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