काव्य :
आजादी
जहाँ देश में भूखी सोती
एक अरब आबादी
वहाँ निरर्थक और अधूरी
लगती है आजादी ।
रोजगार के लिए गाँव से
लोग शहर को जाते
खाते हैं दर- दर की ठोकर
काम न फिर भी पाते
लिखी व्यवस्था ने जीवन की
किस्मत में बर्बादी
वहाँ निरर्थक और अधूरी
लगती है आजादी ।
जहाँ जनम बेटी का घर में
कहलाता हो आफत
भेदभाव की जंजीरों में
सपने होते आहत
कंगाली में जहाँ सताती
कन्याओं की शादी
वहाँ निरर्थक और अधूरी
लगती है आजादी।
हिंदू -मुस्लिम भाईचारा
लगतीं कल की बातें
धार कलम की सहती आई
नेताओं की घातें
गाँधी के सिद्धांत बेचती
संसद में हो खादी
वहाँ निरर्थक और अधूरी
लगती है आजादी।
जहाँ जमीनों पर सज्जन की
करे माफिया कब्जा
और प्रशासन की नीयत पर
आती हो जब लज्जा
जाने कितने न्याय -वास्ते
मर जाते फरियादी
वहाँ निरर्थक और अधूरी
लगती है आजादी।
उठा रहे सेना पर अपनी
जहाँ विपक्षी उँगली
जंतर- मंतर पर अनशन में
बैठें कृषक नकली
करें देश की शोभा धूमिल
जब चाहें उन्मादी
वहाँ निरर्थक और अधूरी
लगती है आजादी।
शिक्षा और चिकित्सा महँगी
हद से ज्यादा मिलती
दिल के आँगन में ख्वाबों की
रोज चिता है जलती
हुई बेबसी मौन जहाँ धर
दुख सहने की आदी
वहाँ निरर्थक और अधूरी
लगती है आजादी।
- उपमेंद्र सक्सेना एडवोकेट, बरेली
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