कांवड़ यात्रा परम्परा : बम-बम भोले की जयकार
-डाॅ. राकेश सक्सेना , एटा
काँवर संस्कृत के शब्द ' काँवारथी ' से बना है। इसी को कांवड़ कहा जाने लगा, जिसका अर्थ कंधा होता है। ये एक प्रकार की बहंगी है जो बाँस की फट्टी से इस प्रकार बनाई जाती है कि किसी वस्तु को रखकर लम्बी दूरी तक पैदल चलकर गंतव्य स्थान तक पहुँचा जा सके और उसमें कोई असुविधा भी न हो। काँवर या कांवड़ इसी उपकरण का नाम है, इसे अँग्रेजी में योक कहा जाता है। ये सामान्य काँवर, डाक काँवर, खड़ी काँवर, दांडी काँवर चार प्रकार की होती हैं। सामान्य काँवर वाले कहीं भी रुककर विश्राम कर सकते हैं। विश्राम के समय जमीन पर न रखकर इसको स्टेन्ड पर रखना होता है। डाक काँवर वाले अनवरत चलते रहते हैं और शिवधाम की यात्रा निश्चित समय में पूरी करते हैं,यात्रा के मध्य उत्सर्जन की क्रियाएँ भी वर्जित होती हैं। खड़ी काँवर वाले अपने साथ कोई न कोई सहयोगी लेकर चलते हैं। दांडी काँवर वाले भक्त शिवधाम की यात्रा दंड देते हुए पूरी करते हैं अर्थात काँवर पथ की दूरी को अपने शरीर की लम्बाई से लेटकर नापते हुए पूरी करते हैं। ये यात्रा बहुत ही मुश्किल होती है। काँवर उठाने वाले शिन के भक्तों को काँवरिया कहा जाता है। काँवड़ यात्रा जीवन यात्रा का प्रतीक है। इन भक्तों का मूल उद्देश्य पवित्रता, अनुशासन व वैरागी भाव के साथ शिव शक्ति से जुड़ना होता है।
धर्मग्रंथों के अनुसार जब काँवड़ से जुड़े दोनों पात्र जिन्हें ब्रह्मघट और विष्णुघट कहा जाता है, पवित्र जल से भर लिए जाते हैं और उन्हें बाँस की डण्डी के सहारे स्थापित कर दिया जाता है। मान्यता है कि शिव बाँस में समाहित हैं। इस प्रकार काँवरिया ( काँवड़िया ) काँवर ( काँवड़ ) के माध्यम से ब्रह्मा, विष्णु, महेश त्रिदेवों की कृपा एक साथ प्राप्त करते हैं। ये फलदायी यात्रा श्रावण मास के पहले दिन से शुरू हो जाती है। इस यात्रा में गंगा नदी से पवित्र जल लाकर प्रमुख शिव मंदिरों में स्थापित शिवलिंगों का अभिषेक किया जाता है। इस यात्रा से भक्त की सभी मनोकामनाएँ पूरी होतीं हैं, जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होता है, शिवधाम को प्राप्त होता है एवं परिवार में सुख, शान्ति व समृद्धि आती है।
बताया जाता है कि श्रावण मास में समुद्र मंथन के समय विष निकला था। संसार की रक्षा हेतु भगवान शिव ने विष को पी लिया था। इसका सेवन करने से उनका शरीर जलने लगा था। उनके शरीर को जलता हुआ देखकर देवगणों ने उन पर जल अर्पित करना शुरू कर दिया। जल अर्पित करने के कारण भगवान शिव का शरीर ठंडा हो गया और विष से राहत मिली। इसके बाद से श्रावण मास में शिव का जलाभिषेक करने की परम्परा शुरू हो गई। मान्यताओं व मतभेदों के अनुसार भगवान राम, रावण , परशुराम एवं श्रवण कुमार को प्रथम काँवरिया बताया जाता है। आनंद रामायण में उल्लेख मिलता है कि भगवान राम ने झारखंड के सुल्तानगंज से काँवड़ भरकर देवघर स्थित वैद्यनाथ शिवलिंग का जलाभिषेक किया था। तो कुछ विद्वानों का मानना है कि शिव के अनन्य भक्त रावण ने ' पुरा महादेव ' स्थित शिव मंदिर में जलाभिषेक किया था। कुछ लोग बताते हैं कि भगवान परशुराम ने गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर बागपत स्थित मंदिर में शिवलिंग का जलाभिषेक किया वहीं पर विद्वानों का मत है कि श्रवण कुमार ने त्रेतायुग में पहली बार काँवड़ यात्रा की थी। उनके माता-पिता अंधे थे,उन्होंने जब गंगा स्नान की इच्छा व्यक्त की तो श्रवण कुमार अपने अंधे माता-पिता को काँवड़ में बिठाकर हरिद्वार लाए और उन्हें स्नान कराया था। काँवड़ यात्रा का प्रथम व्यक्ति कौन था? यद्यपि इस संदर्भ में विभिन्न मत सामने आते हैं तथापि लम्बे समय से इस परम्परा का लाखों शिवभक्त बम-बम भोले , बोल बम-बम उच्चारण के साथ आज भी अनुसरण कर रहे हैं। इन शब्दों का गहन अर्थ है -- प्रथम बम का अर्थ है ब्रह्म,ब्रह्मांड, समग्र सृष्टि, दूसरे बम का अर्थ है-- नाद ( ध्वनि,ऊर्जा जो इसमें मौजूद है ) तो बम-बम भोले का अर्थ हुआ कि भगवान शिव ऊर्जा, नाद,ओंकार के रूप में पूरे ब्रह्माण्ड में मौजूद हैं, सबसे शक्तिशाली हैं, निर्मल, शांत व भोले हैं।
-डाॅ. राकेश सक्सेना ,
पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष,
68, शान्तीनगर, एटा ( उ0प्र0 ) 207001
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