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लघु कथा :माँ, पहले कौन झुके? -डॉ रीटा अरोड़ा , करनाल



लघु कथा :

माँ, पहले कौन झुके?

“माँ, क्या सचमुच रिश्ते इतने कमजोर हो गए हैं?” बेटी ने माँ की गोद में सिर रखते हुए पूछा।

माँ ने उसके बालों में उँगलियाँ फेरते हुए कहा, “रिश्ते कमजोर नहीं हुए बेटा… शायद हम उन्हें संभालने का धैर्य खोते जा रहे हैं।”

“लेकिन माँ, जब अपना ही कोई दिल दुखाए तो कितना सहें?”

माँ की आँखें नम हो गईं।
“दुख सहना जरूरी नहीं है बेटी… लेकिन हर दुख के बाद रिश्ता छोड़ देना भी जरूरी नहीं।”

“आपने भी तो बहुत बार पापा से नाराज़ होकर बात नहीं की होगी?”

माँ हल्का-सा मुस्कुराईं, “हाँ, कई बार। कभी मुझे लगा मैं सही हूँ, कभी उन्हें। लेकिन सुबह जब चाय बनती थी न… तो मन कहता था, *इतने वर्षों का साथ इस एक बात से बड़ा है।*”

“अगर सामने वाला अपनी गलती न माने तो?”

“तो तुम अपनी सच्चाई छोड़ना मत… मगर अपना दिल भी पत्थर मत बनाना।”

बेटी ने माँ का हाथ पकड़ लिया।

“माँ, आजकल लोग कहते हैं- जो तुम्हें समझे नहीं, उसे छोड़ दो।”

माँ ने धीरे से कहा, “हर किसी को छोड़ देना आसान है बेटी… मुश्किल यह समझना है कि कौन-सा रिश्ता बचाने लायक है और कौन-सी दूरी जरूरी है।”

“और अगली पीढ़ी?”

माँ ने बेटी की आँखों में देखते हुए कहा-

“उन्हें यह मत सिखाना कि हर बहस जीतनी है। उन्हें यह सिखाना कि कभी-कभी किसी अपने का हाथ पकड़कर कहना भी जरूरी होता है- *चलो, फिर से बात करते हैं…*”

बेटी ने माँ को कसकर गले लगा लिया।

कुछ देर दोनों चुप रहीं… मगर उस खामोशी में जैसे कई पीढ़ियों की बातें सुनाई दे रही थीं।

- डॉ रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत एसोसिएट प्रोफेसर करनाल
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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