काव्य :
कन्हैया मेरा मन बोले
ऐसी बजा बंसी कन्हैया मेरा मन बोले
ऐसी सजा पंखी कन्हैया मेरा तन डोले
केश घने तेरे घुंघराले बड़े हैं
कानों में कुंडल खूब बजे हैं
ऐसी दिखा दे मुस्कनिया
कन्हैया मेरा मन बोले...
तिरछी नजर कटार चलत है
नील बदन पारिजात महक है
ऐसी तोड़ दे तू गगरिया
कन्हैया मेरा मन बोले...
मोर मुकुट पीताम्बर धरे है
गले में बैजंती माला धरे है
ऐसी सजा तू करधनिया
कन्हैया मेरा मन बोले....
टेडी कमरिया लकुटी धरी है
कदम्ब के नीचे राधा खड़ी है
ऐसी नचा दे तू सखियाँ
कन्हैया मेरा मन बोले...
- संदीप नेमा 'दीप' भोपाल
मोबाइल 9993956366
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