हिन्दी का दिल बहुत बड़ा है - इक़बाल मसूद
भोपाल । " आकार " साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समिति, भोपाल ने हिंदी दिवस के अवसर पर, लघुकथा शोध केंद्र समिति के कार्यालय, हिन्दी भवन में, “हिन्दी हैं हम” शीर्षक के अंतर्गत एक कार्यक्रम आयोजित किया।
इस अवसर पर अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार इक़बाल मसूद ने अपने उद्बोधन में कहा कि -
“अमीर ख़ुसरो के द्वारा उर्दू लिपि में लिखे गए दोहे और गीतों को हिन्दी ने वैसा का वैसा अपना लिया। मलिक मोहम्मद जायसी का महाकाव्य 'पद्मावत' हिंदी साहित्य की सूफी प्रेमाश्रयी काव्यधारा की सर्वोच्च कृति है। जिसे उर्दू नस्तालीक़ में लिखा गया। हिन्दी ने उसे अपना कवि मान लिया। सैयद इंशा अल्ला खाँ द्वारा लिखी गई रानी केतकी की कहानी को हिन्दी की पहली कहानी या पहली गद्य रचना मान लिया गया। इसलिए हम ये मानते हैं कि हिन्दी का दिल बहुत बड़ा है। इस भाषा में सभी भारतीय भाषाओं को सहेजने की अपार क्षमता है।”
मुख्य अतिथि बलराम गुमाश्ता ने कहा कि -
“हिंदी और उर्दू के विकास का क्रम लगभग एक साथ ही रहा। आज हिंदी भाषा के तकनीकी विकास की आवश्यकता है। विश्व के लगभग सत्तर देशों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है। हिंदी के विकास में हम सब का भी योगदान है।”
विशिष्ठ अतिथि मुकेश वर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि -
“हिन्दी का अन्य भारतीय भाषाओं के साथ संवाद ज़रूरी है। हिन्दी के साथ मुसीबत ये है कि हिन्दी को राष्ट्रभाषा तो कहा गया लेकिन उसका दर्जा नहीं दिया गया। दर्जा नहीं दिए जाने के पीछे बहुत से कारण हैं। हमें अपने व्यवहार में उदारता लानी होगी। तभी हिन्दी के राष्ट्रभाषा बनने का मार्ग प्रशस्त होगा।
विशिष्ट अतिथि कान्ता रॉय ने हिन्दी के उद्भव और विकास शीर्षक के अंतर्गत अपने विचार रखते हुए कहा कि -
“ हिंदी भाषा का उद्भव और विकास संस्कृत भाषा से हुआ। संस्कृत से पाली, पाली से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश, अपभ्रंश से अव्हाट होती हुई हिंदी हम तक पहुंची है। सन् 1800 में ही जॉन गिलक्रिस्ट के निर्देशन में फो़र्ट विलयम कॉलेज में हिन्दी का अध्यापन प्रारंभ हो गया था। भारतेंदु हरिश्चंद्र और महावीर प्रसाद द्विवेदी के प्रयासों से खड़ी बोली को आधुनिक मानक हिंदी का रूप मिला।”
विशिष्ट अतिथि मेहमूद मालिक ने उर्दू के फ़रोग़ में हिंदी की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए अनेक उर्दू साहित्य कारों के रचनाओं में किस प्रकार से हिन्दी के शब्दों का प्रयोग किया गया, उन्हें उद्धृत करते हुए कहा कि -
“ हिन्दोस्तान बहुभाषी मुल्क है जहाँ मुख़्तलिफ़ मज़ाहिब और अक़ाइद के लोग साथ-साथ रहते हैं और मुख्तलिफ ज़बानें और बोलियाँ बोलते हैं। यह संस्कृति हमारे मुल्क को समृद्ध बनाती है। हम जो भाषा बोलते हैं उसमें उर्दू शामिल है और उर्दू में जो साहित्य लिखा जाता है उसमें हिन्दी के शब्द बहुतायत में लिखे जाते हैं। उर्दू वर्ण माला के 37 अक्षर हैं जिनमे अधिकांश हिन्दी से लिए गए हैं। इनके बिना एक भी जुमला पूरा नहीं किया जा सकता।
उर्दू नज़्म हो या नस्र उसमें हिंदी के बहुत से अल्फ़ाज़ मौजूद होते हैं। जो तहरीर और कलाम को ख़ूबसूरत बनाते हैं। उर्दू में गीत, दोहा और पद हिन्दी की ही देन हैं। नज़ीर अकबराबादी से लेकर अज़मतुल्लाह, बेकल उत्साही और निदाफाज़ली तक ने अपने कलाम में हिन्दी के ख़ूबसूरत अल्फ़ाज़ का इस्तेमाल किया है। " ज़ुबैर रिज़वी "के एक मशहूर गीत का बंद है।
“ये है मेरा हिन्दोस्तान, मेरे सपनों का जहान
इससे प्यार है मुझको
हँसता गाता जीवन इसका धूम मचाते मौसम
गंगा - जमुना की लहरों में सात सुरों का संगम
ताज - एलोरा जैसे सुन्दर तस्वीरों के एल्बम
ये है मेरा हिन्दोस्तान, मेरे सपनों का जहान
इससे प्यार है मुझको”
वक्ता के तौर पर “हिंदी और हमवतन ’ उन्वान के तहत आसिम हुसैन फ़ारुक़ी ने कहा कि -
“ हिन्दी हमारे वतन की रूह और कसरत में वहदत की सबसे बड़ी अलामत है। ये हमारी गुफ़्तुगू का ज़रिया ही नहीं बल्कि हमारे हमवतनों को मोतियों के हार की तरह एक दूसरे से जोड़ने वाला मज़बूत सक़ाफ़ती धागा भी है। मशरिक़ से मग़रिब और शुमाल से जुनूब तक मुख़्तलिफ़ ज़बानें बोलने वाले जब आपस में मिलते हैं तो हिन्दी उनके दरमियान बातचीत का सबसे आसान ज़रिया बनती है।
एक अन्य वक्ता निम्रा सिद्दीक़ी ने “डिजिटल युग में हिन्दी की संभावनाएं और चुनौतियाँ” विषय पर अपनी बात करते हुए कहा कि -
“भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं है। भाषा एक जीवंत संस्कृति होती है। यह हमारे सोचने का तरीका है, हमारे महसूस करने का माध्यम है और जब हमारी संस्कृति ख़ुद डिजिटल हो रही है। हमारा मनोरंजन OTT पर है, हमारी खरीदारी ई-कॉमस पर है, हमारे रिश्ते सोशल मीडया पर हैं। … तो स्वाभाविक है कि इस डिजिटल संस्कृति की अभव्यिक्त का प्रमुख माध्यम, हमारी भाषा का डिजिटलीकरण होना भी स्वाभाविक है। भाषा का डिजिटलीकरण कोई विकल्प नहीं, बल्कि यह इस समय की अनिवार्यता है।
"दुनिया भर में भारतीय सॉफ़्टवेयर डेवलपर्स का दबदबा है। गूगल-माइक्रोसॉफ़्ट जैसी कंपनियों के शीर्ष पदों पर भारतीय हैं... फिर भी मूल रूप से हिन्दी में बने सॉफ़्टवेयर/ऐप्स की भारी कमी क्यों है?"”
भोपाल शहर के तमाम साहित्य के बड़े हस्ताक्षर, अदब नवाज़ दोस्त, पत्रकार अंत तक कार्यक्रम में बने रहे।
कार्यक्रम का संचालन करते हुए मुज़फ़्फ़र इक़बाल सिद्दीक़ी ने अपनी भूमिका में कहा कि -
“एक सर्वे के अनुसार विश्व में तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है।”
जहाँ डॉ. शकील ख़ान ने बहुत ही आदर और सम्मान के साथ सभी अतिथियों का स्वागत किया तो वहीं सूफ़िया ख़ान ने सभी अतिथियों का, आयोजकों का और उपस्थित साहित्य सुधिजनों का आत्मीय आभार व्यक्त किया।
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प्रस्तुति - मुज़फ़्फ़र इक़बाल सिद्दीक़ी
Tags:
साहित्यिक समाचार
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