"सुभद्रा कुमारी चौहान की काव्य चेतना"
--विवेक रंजन श्रीवास्तव , भोपाल
सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता का एक अत्यंत आत्मीय पक्ष उनका बालमन और मातृत्व है।
उनकी कविता‘कदंब का पेड़’ में बच्चा कृष्ण बनने का स्वप्न देखता है। यह कविता हमें बताती है कि बाल-संसार में प्रकृति, पौराणिक स्मृति और माँ का स्नेह किस तरह एकाकार हो जाते हैं।
यह कदंब का पेड़ अगर माँ
होता यमुना तीरे।
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे॥
वहीं बैठ फिर बड़े मजे से मैं बाँसुरी बजाता।
माँ, तब माँ का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता।
जब-जब माँ तुम मुझे देखने यमुना तट पर आतीं।
तब-तब मैं छिप जाता, तुमसे नहीं दिखाई पड़ता।
इन पंक्तियों में बालक की कल्पना और माँ की ममता का सुंदर संसार बुना गया है। कदम्ब का पेड़ केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं रहता, वह खेल, स्वतंत्रता और स्नेह का आश्रय बन जाता है। सुभद्रा जी की काव्य चेतना में मातृत्व भावुकता से आगे बढ़कर जीवन की आत्मीय आधारभूमि बनता है।
सुभद्रा कुमारी चौहान का रचनात्मक जीवन उस दौर में विकसित हुआ जब भारत ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष कर रहा था। वे स्वयं स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहीं। इस अनुभव ने उनकी कविता को केवल कल्पना नहीं, बल्कि जीवन-संघर्ष का स्वर दिया।
उनकी अमर कविता ‘झाँसी की रानी’ में रानी लक्ष्मीबाई की छवि स्त्री-शक्ति और राष्ट्रीय प्रतिरोध का प्रतीक बनती है।
सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी।
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी।
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी।
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
इस कविता में वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई को केंद्र में रखकर उन्होंने स्त्री को इतिहास की सक्रिय शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है। स्त्री-विमर्श की दृष्टि से यह रचना इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसमें स्त्री की राजनीतिक स्थिति और नेतृत्व सामने आता है। ‘मर्दानी’ शब्द पर आधुनिक आलोचना प्रश्न उठा सकती है, क्या वीरता को प्रमाणित करने के लिए स्त्री को पुरुषत्व की कसौटी पर रखना आवश्यक है? इस प्रश्न के साथ पढ़ने पर कविता का ऐतिहासिक योगदान और भाषिक संदर्भ दोनों स्पष्ट होते हैं।
उनकी एक अन्य महत्वपूर्ण कविता है
‘वीरों का कैसा हो वसंत?’ जिसमें प्रकृति के उल्लास को राष्ट्रीय दायित्व के प्रश्न से जोड़ा गया है। वसंत की सुंदरता के बीच कवयित्री तत्कालीन संघर्षरत समाज के सामने एक नैतिक प्रश्न रखती हैं।
फूली सरसों ने दिया रंग,
मधु लेकर आ पहुँचा अनंग,
वधू-वसुधा पुलकित अंग-अंग
है वीर वेश में किंतु कंत
वीरों का कैसा हो वसंत?
गलबाहें हों या हो कृपाण,
चल-चितवन हो या धनुष-बाण।
यहाँ ऋतु-वर्णन अचानक राष्ट्रीय चेतना में बदल जाता है। सरसों, वसुधा और प्रेम के बिंबों के बीच तलवार और धनुष-बाण की उपस्थिति उनके समय की सामाजिक बेचैनी को कविता में व्यक्त करती है।
सुभद्रा जी के लिए वसंत केवल सौंदर्य का मौसम नहीं, बल्कि यह विचार करने का अवसर भी है कि समाज के संकट में लोक दायित्व क्या है।
सुभद्रा जी की राष्ट्रीय चेतना केवल शौर्य और विजय तक सीमित नहीं है। ‘जलियाँवाला बाग में वसंत’ में शहीदों की स्मृति और रक्तरंजित इतिहास के सामने प्रकृति के उल्लास को संयमित किया गया है।
यहाँ कोकिला नहीं, काग हैं,
शोर मचाते, काले कीट,
भ्रमरो का भ्रम उपजाते।
कलियाँ भी अधखिली,
मिली हैं कंटक-कुल से,
पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे।
परिमल-हीन पराग दाग सा बना पड़ा है,हा!
यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है।आओ प्रिय ऋतुराज!
किन्तु धीरे से आना,यह है शोक-स्थान यहाँ मत शोर मचाना।
कविता में वसंत की छवि शोक से गुजरती है। प्रकृति की सुंदरता और मनुष्य की हिंसक त्रासदी का यह विरोधाभास पाठक को संवेदना के स्तर पर झकझोरता है। राष्ट्रप्रेम यहाँ केवल आक्रोश नहीं, शहीदों की स्मृति के प्रति नैतिक जिम्मेदारी भी है।
सुभद्रा जी का समय सामाजिक परिवर्तन का समय था। स्त्रियों की शिक्षा, सार्वजनिक भागीदारी और स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका को लेकर नए प्रश्न उठ रहे थे। सामाजिक संरचनाएँ पितृसत्तात्मक थीं और स्त्री की पहचान अक्सर परिवार, विवाह और मातृत्व से परिभाषित की जाती थी।
सुभद्रा जी का जीवन और साहित्य इस परिवर्तनशील परिस्थिति में पढ़ा जाना चाहिए। उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की और स्त्री को केवल घरेलू भूमिका तक सीमित छवि में नहीं रखा। ‘झाँसी की रानी’ में स्त्री का राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व तथा उनके वात्सल्यपरक लेखन में स्त्री के भावनात्मक संसार का विस्तार दिखाई देता है।
सुभद्रा जी को आधुनिक स्त्री-विमर्श की सभी अवधारणाओं का प्रत्यक्ष प्रवक्ता मानना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन उनके साहित्य में स्त्री की सक्रियता, साहस और मानवीय गरिमा के ऐसे स्वर अवश्य हैं, जिनसे आधुनिक पाठक संवाद कर सकता है।
उनकी भाषा की सरलता, भाव की गहराई , छंद बद्ध काव्य ने उनकी रचनाओं को अमरत्व प्रदान किया है।
सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता की एक बड़ी शक्ति उनकी सहज और प्रवाहमय भाषा है। वे पाठक को जटिल शब्दों के माध्यम से प्रभावित करने के बजाय भावों की सीधी अनुभूति कराती हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ स्मरणीय और व्यापक रूप से लोकप्रिय हुईं।
उनकी भाषा में लोकगाथा का स्वर है, घर की बातचीत की आत्मीयता है और राष्ट्रीय चेतना का ओज है। ‘कदंब का पेड़’ में बालमन बोलता है, ‘झाँसी की रानी’ में इतिहास जागता है और ‘जलियाँवाला बाग में वसंत’ में स्मृति करुणा बन जाती है।
यह विविधता बताती है कि सरलता और गहराई परस्पर विरोधी नहीं हैं। सच्ची अनुभूति को सहज भाषा में व्यक्त करना उनकी शैली की बड़ी साहित्यिक उपलब्धि है।
सुभद्रा कुमारी चौहान की काव्य चेतना को यदि एक प्रतीक में समेटना हो, तो वह कदंब का पेड़ हो सकता है। उसकी डाल पर बैठा बच्चा कन्हैया बनने का स्वप्न देखता है, और उसी स्मृति की दूसरी छोर पर झाँसी की रानी इतिहास से आँख मिलाती खड़ी है।
इन दोनों छवियों के बीच मातृत्व, स्मृति, राष्ट्रप्रेम और स्त्री की सक्रियता का सेतु है। सुभद्रा जी की कविता हमें यह समझने का अवसर देती है कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक मुक्ति का नाम नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा और चेतना के विस्तार का प्रश्न है।
उनकी कविता आज भी इसलिए जीवित है कि वह केवल अतीत का गुणगान नहीं करती। वह वर्तमान से पूछती है, क्या हम अपने समय के अन्याय को पहचानते हैं? क्या स्त्री को उसकी संपूर्ण मानवीय स्वतंत्रता मिलती है? क्या हमारी राष्ट्रीय चेतना करुणा और न्याय से जुड़ी है? उन्होंने ममता को दुर्बलता नहीं बनने दिया और वीरता को संवेदनहीन नहीं होने दिया।
कविता जब इन दोनों को एक साथ साध लेती है, तब वह केवल साहित्य नहीं रहती,वह जीवन को देखने की एक दृष्टि बन जाती है।
— विवेक रंजन श्रीवास्तव
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