लघु कथा :
सच्ची पूजा
“माँ, चार धाम करके आया हूँ।”
“अच्छा! मन शांत हुआ?”
“बहुत। भगवान खुश हो गए होंगे।”
माँ मुस्कुराई, “पक्का?”
“क्यों?”
“कल शर्मा जी का दिल क्यों दुखाया?”
“वो गलत बोल रहे थे।”
“बहू से भी नाराज़ थे?”
“हाँ… थोड़ा।”
माँ चुप रही।
“क्या हुआ?”
“मंदिर में भगवान को खुश करते हो…”
“तो?”
“घर में इंसानों को क्यों दुख देते हो?”
वह चुप हो गया।
“माँ, पूजा-पाठ तो जरूरी है।”
“बिल्कुल।”
“फिर?”
“भगवान के घर हिसाब भी तो होगा।”
“कैसा हिसाब?”
माँ ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा-
“कितनी बार मंदिर गए, ये नहीं…
तुम्हारी वजह से कितने दिल रोए, ये गिना जाएगा।”
वह सिर झुका गया।
माँ ने बस इतना कहा-
“भगवान को ढूँढ़ने से पहले, इंसान को मत खोना।”
- डॉ रीटा अरोड़ा , करनाल
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कथा कहानी
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