लघु कथा :
पाँच सेकंड
“पापा, आपने उन्हें जवाब क्यों नहीं दिया?”
संदेश ने घर में घुसते ही कहा, “उन्होंने सबके सामने आपका अपमान किया था!”
पापा ने चुपचाप पानी का गिलास उठाया और बोले, “मन तो मेरा भी बहुत हुआ था।”
“फिर चुप क्यों रहे?”
पापा मुस्कुराए, “बस… पाँच सेकंड रुक गया।”
“पाँच सेकंड?”
“हाँ। सोचा, अभी जवाब दूँगा तो बात बढ़ेगी। पाँच सेकंड बाद लगा-हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं होता।”
संदेश कुछ देर उन्हें देखता रहा।
“लेकिन पाँच सेकंड में ऐसा क्या बदल जाता है?”
पापा ने कहा, “शायद कुछ नहीं… और शायद बहुत कुछ। बस इतना समय मिल जाता है कि हम जो महसूस कर रहे हैं और जो करने जा रहे हैं, उनके बीच थोड़ा-सा फासला आ जाए।”
“तो जब बहुत गुस्सा आए?”
“रुको… साँस लो… पाँच तक गिनो। फिर जो सही लगे, वह करना।”
कुछ दिनों बाद संदेश के साथ भी ऐसा ही हुआ। उसके सामने वही दोस्त खड़ा था, जिसने सबके सामने उसे अपमानित किया था।
जवाब उसके होंठों तक आया।
वह रुक गया।
5… 4… 3… 2… 1…
दोस्त आगे बढ़ गया।
संदेश चुपचाप वहीं खड़ा रहा।
उस रात उसे पापा की बात बार-बार याद आती रही।
उसे पहली बार लगा-हम जिंदगी में कितनी बार किसी के शब्दों से आहत होकर तुरंत जवाब दे देते हैं… और फिर बाद में सोचते हैं कि काश, उस वक्त थोड़ा रुक गए होते।
कितनी बार एक टेक्स्ट भेजने से पहले…
एक रिश्ता तोड़ने से पहले…
किसी अपने को कठोर शब्द कहने से पहले…
हमें बस पाँच सेकंड की जरूरत होती है।
लेकिन वे पाँच सेकंड हम अक्सर देते ही नहीं।
संदेश ने खिड़की से बाहर देखा।
मन में एक सवाल उठा-
अगर हर बड़ी गलती से पहले जिंदगी हमें सचमुच पाँच सेकंड देती है…
तो आखिर हम कितनी बार उस पाँच सेकंड को पहचान पाते हैं?
- डॉ रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल
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कथा कहानी
